एक आयत तीन उसूल​

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Ek aayat teen usool
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Ek aayat teen usool

بسم اللہ الرحمٰن الرحیم

एक आयत तीन उसूल​

तहरीर : शेख अब्दुल ग़फ़्फ़ार सलफ़ी हफ़ीज़हुल्लाह

अल्लाह तआला ने सौराह حم السجدہ की आयत नंबर 33 में फ़रमाया:

وَ مَنۡ اَحۡسَنُ قَوۡلًا مِّمَّنۡ دَعَاۤ اِلَی اللّٰہِ وَ عَمِلَ صَالِحًا وَّ قَالَ اِنَّنِیۡ مِنَ الۡمُسۡلِمِیۡنَ​

“और उससे ज़्यादा अच्छीi बात वाला कौन है जो अल्लाह की तरफ बुलाये और नेक काम करे और कहे के में यक़ीनन मुसलमानों में से हूँ .”

ग़ौर करें तो इस मुख़्तसर सी आयत ए करीमह में दावत ए दीन की अहमियत और फ़ज़ीलत के साथ साथ उसके तीन अहेम उसूल बयान किये गए हैं.

1– इखलास:​

दीन की पूरी बुनियाद इखलास पर है. दावत ए दीन का काम भी अल्लाह के यहाँ उसी वक़्त मक़बूल होगा

जब के यह इखलास की बुनियादों पर हो. दावत देने का मक़सूद अल्लाह की तरफ बुलाना हो.

जिस दावत के पास ए पर्दा (पीछे) खुदनुमाई (अपनी मश-होरी) मक़सूद हो,

किसी ख़ास नज़रिये की तरवीज (फैलाना) मक़सूद हो,

दावत ए ईलाल अल्लाह (अल्लाह की तरफ दावत) के नाम पर

अकाबिर परस्ती (बुज़ुर्गान ए दीन की पूजा) की तालीम दी जा रही हो

तो ऐसी दावत खुद दाई के लिए भी और मड़ुवीं (यानी जिसे दावत दी जा रही है)

के लिए भी हलाकत और वबाल का बाइस है.दावत की राह में काम करते हुए लाज़िम है

के हम पहले अपनी निय्यतों को टटोल लें के हमारे पेश ए नज़र मक़सद क्या है.

अगर नियत ही फ़ासिद और ख़राब है तो हमारी सारी मेहनत व

हरकत बेकार और बर्बाद हो जाये गई.

2– दाई के किरदार की बुलंदी​

दावत के मैदान में सिर्फ हमारी गुफ़्तार (बात चीत) नहीं देखी जाती बल्कि हमारे किरदार पर भी नज़र रखी जाती है,

दावत के मैदान में लहजे की मिठास और हकीमाना (समझदारी) अंदाज़ की जितनी अहमियत है उतनी ही अहमियत दाई

के हुस्न ए अमल की भी है. बसा औक़ात (कभी कभार) दाई अपने क़ौल से

ज़ियादा अमल और किरदार से लोगों को मुतास्सिर करता है

और इसी के बार-अक्स (उलट) ज़बान और बयान की तमाम तर खूबियों के बावजूद कभी कभी दावत इसलिए भी नाकाम साबित होती है

के दाई का अपना किरदार सहीह नहीं होता. क़ुरान ए हकीम की यह आयत हमें बताती है के दाई का किरदार हमेशा बुलंद होना चाहिए.

अमल ए सालेह क़ुरान ए हकीम की वह इस्तिलाह है जिस के अंदर खैर के तमाम पहलु सिमट आते हैं .

3– अक़ीदे की सलाबत और सख्ती​

दाई हिकमत और नसीहत के साथ काम करे यह चीज़ शरीअत में ऐन मतलूब है

मगर इस का क़तई यह मतलब नहीं के हिकमत और मस्लेहत के नाम पर वह अपने उसूलों से समझौता करे,

अपने अक़ीदे के इज़हार के सिलसिले में किसी क़िस्म की मुड़ाहट बरते

(यानी जो अक़ीक़ाह दिल में हो उसके बरख़िलाफ़ ज़ाहिर करे). बल्कि एक दाई का फ़र्ज़ है

के जहाँ भी मौक़ा और महल आये वह इस बात के इज़हार में न चुके के «اِنَّنِیۡ مِنَ الۡمُسۡلِمِیۡنَ यानी

मैं दीन ए इस्लाम का पैरोकार हूँ, दीन ए तौहीद का अलम्बरदार हूँ.

एक दाई की यह अहेम तरीन ज़िम्मेदारी है के मुश्किल से मुश्किल हालात में

भी वह तौहीद और शिर्क को, इस्लाम और कुफ्र को, इत्तेबाअ

और इब्तिदा (बिदअत) को गडमड न करे. वह हक़ और बातिल के दरमियान फ़र्क़ को हमेशा

क़ायम रखे जिसे क़ुरान और सुन्नत में फ़ुरक़ान से ताबीर किया गया है .

यानि वो चीज़ जो सच और झूट में तमीज करे.

वल्लाहुआलाम

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