जानिए 40 बातें जिससे घर में गरीबी आती है और उससे मुतालिक ग़लत फ़हमियां

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जानिए 40 बातें जिससे घर में गरीबी आती है और उससे मुतालिक ग़लत फ़हमियां

Logon Mein Phaili 40 Ghalat Fehmiyan (Part-1)

क्या 40 बातों से घर में ग़रीबी आती है

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيم

लोगों में फैली 40 ग़लत फ़हमियां (Part-1)

सोशल मीडिया पर कई महीनो से एक पोस्ट घूम रही है जिस में बताया गया है

के 40 बातों से घर में ग़ुरबत (ग़रीबी) आती है. आइये एक एक करके उन बातों को देखते हैं की वो कितनी सहीह हैं:

 

(1) ग़ुस्ल खाने में पिशाब करना:

हमाम (ग़ुस्ल खाने) में पेशाब करने से नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मना फ़रमाया है

मगर उस वक़्त के हमाम मट्टी के होते थे और आज कल के हमाम पक्के होते हैं,

इस लिए उस में पेशाब करना जाएज़ है. और यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान में नहीं है

के हमाम में पेशाब करने से ग़ुरबत (ग़रीबी) आती है,

हज़रत अली रदिअल्लहु अन्हु की तरफ यह क़ौल (बात) मंसूब किया जाता है मगर यह झूट है.

 

(2) टूटी हुई कंघी (Comb) से कंघा करना:

नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हुक्म है :

जिस के बाल (Hairs) हों वह उन की इज़्ज़त करे.

(अबु दावूद: 4163) सहीह

इस हदीस से पता चला के बालों की ज़ीनत के लिए कंघी करनी चाहिए.

चाहे कंघी टूटी हो या सलीम हो (टूटी हुए न हो), अगर काम लायक है

तो कंघी करें कोई हर्ज नहीं है और न ही इस के करने से गरीबी आती है.

 

(3) टूटा हुआ सामान इस्तेमाल करना:

टूटा हुआ सामान काम के लाइक हो तो उस का इस्तेमाल जाएज़ है.

हज़रत उम्म ए सलमा रदिअल्लहु अन्हा से रिवायत है

के वह रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा रज़िअल्लहु अन्हुम के लिए एक चौड़े बर्तन में खाना लायें.

(इतने में) हज़रत ऐसा रज़िअल्लाहु अन्हा आ गईं. उन्हों ने एक चादर ओढ़ रखी थी

और उन के पास एक पथ्थर था. उन्हों ने पथ्थर मार कर बर्तन तोड़ दिया.

नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि ने बर्तन के दोनों टुकड़ों को मिला कर रखा और दो बार फ़रमाया:

खाओ, तुम्हारी माँ को ग़ैरत आगे थी. उस के बाद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने

हज़रत ऐसा रज़िअल्लहु अन्हा का बर्तन ले कर हज़रत उम्म ए सलमा रज़िअल्लाहु अन्हा के हाँ (घर, पास) भेज दिया

और हज़रत उम्म ए सलमा रज़िअल्लाहु अन्हा का (टूटा हुआ) बर्तन हज़रत ऐसा रज़िअल्लाहु अन्हा को दे दिया.

(सुनें नसाई: किताब: عشرة النساء, बाब: الغیرۃ: हदीस न०: 3956)

अल्लामा अल्बानी रहिमहुल्लाह ने हदीस को सहीह कहा है.

(सहीह सुनें नसाई: 3693)

(4) घर में कोड़ा करकट (كوڑا کرکٹ) रखना:

घर का कोड़ा करकट घर के किसी कोने में जमा करने में कोई हर्ज नहीं है,

जब ज़ियादा हो जाये तो फ़ेंक दें. इस में एक एहतियात यह होना चाहिए

के खाने पीने की बची हुई ज़ायेद (ज़ादा) चीज़ें जाया (बर्बाद) न करें बल्के किसी को दे दें.

घर में कोड़ा रखने से गरीबी आती है यह भी हज़रत अली रज़िअल्लहु अन्हु की

तरफ मंसूब झूटी बात है.

 

(5) रिश्तेदारों से बदसुलूकी करना:

ऐसा कोई ख़ास फरमान ए नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नहीं है के रिश्ते दारों से बदसुलूकी ग़ुरबत का सबब (रीज़न) है,

लेकिन बोहत सारे ऐसे दलील हैं जिन से पता चलता है के मासियत (नाफरमानी) और गुनाह के काम से रिज़्क़ में तंगी होती है.

 

(6) बाएं पैर से पजामह पहनना:

मुमकिन है के इस से मुराद हो पजामा पहनने में बाएं जानिब से शुरू करना.

नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम शरफ़ वाला काम दाएं से पसंद फरमाते थे,

इस बिना पर (इस वजह से) दाएं जानिब से पजामा पहनना बेहतर और मुस्तहब है

जैसा के हदीस में ये बात मौजूद है. देखें:

(सहीह बुखारी: 168)

मगर किसी ने बायें से पेहन लिया तो कोई मासियत (नाफरमानी) नहीं है

और न ही यह फ़क़्र और फ़ाक़ा (Poverty and Starvation) का सबब बनेगा.

(7) मग़रिब और ईशा के दरमियान सोना:

मग़रिब और ईशा के दर्मियान सोना मकरूह है

इस का सबब ईशा की नमाज़ फौत हो जाना है

इस लिए नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ईशा से पहले सोना

और ईशा के बाद बात करना नापसन्द फरमाते थे. जैसा की हदीस में आया है

(देखें बुखारी: 568).

अगर कोई आदतन (रूटीन के ऐतबार से) नहीं ज़रूरतें (ज़रुरत की वजह से) कभी सो जाये

तो वह ईशा की नमाज़ आधी रात से पहले कभी भी पढ़ ले.

 

(8) मेहमान आने पर नाराज़ होना:

इस्लाम ने मेहमान की खातिर दारी पर उभरा है,

लिहाज़ा किसी मेहमान की आमद पर नाराज़गी का इज़हार न करें.

मेहमान नवाज़ी बहार से अन्य वाले मुसाफिर के वास्ते वाजिब है

और जो मुक़ीम हो उस की ज़ियाफ़त एहसान और सुलूक के दर्जे में है.

जिस ने ज़ियाफ़त में एहसान को छोरा उस पर गुनाह नहीं

मगर वाजिबी ज़ियाफ़त को चोरनी पर मासियत (नाफरमानी) आएगी.

(अहादीस के लिए देखें: सहीह बुखारी: 6135 और 6138)

(9) आमदनी से ज़ियादा खर्च करना:

इसे बेवकूफी, हमाक़त, नासमझी और फाश गलती (जो गलती ज़ाहिर हो) कह सटके हैं.

 

(10) दांत (Teeth) से रोटी काट कर खाना:

दांत से रोटी काट कर खाने से गरीबी नहीं आती,

अगर ऐसा होता तो दुनिया में कोई मालदार ही नहीं होता क्यों के दांतों (Tooth) से काट कर ही लोग बड़े होते हैं.

रोटी तो हाथ से भी तोड़ी जा सकती है मगर ऐसी भी बोहत चीज़ें हैं जिन्हें अक्सर दांत से ही काट कर खाया जाता है.

आज अंग्रेजी स्टाइल आया है और दीहातों (Villages) में तो नहीं शहरों में खाने के साथ चाको (Knife) रख देते हैं

जबके आज से पहले यह Style नहीं चलता था.

 

(11) चालीस दिन से ज़ियादा नाफ के नीचे के बाल रखना:

चालीस दिन के अन्दर नाफ के नीचे के बाल साफ़ कर लेना चाहिए

क्यों के रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यही हद मुक़र्रर की है,

जैसा की सहीह मुस्लिम में हदीस है.

(देखें: सहीह मुस्लिम: 258).

जो इस से ज़ियादा ताख़ीर (Late) करते हैं वह सुन्नत की मुखालिफत करते हैं,

 

(12) दांत (Teeth) से नाख़ून (Nails) काटना:

इस्लाम में कहीं दांतों (Tooth) से नाख़ून काटने की मोमनियत नहीं आयी है,

लेकिन चुके इस्लाम सेहत की हिफाज़त पर ध्यान दिलाता है

इस लिए अगर दांत से नाख़ून काटने में कोई तिब्बी (Medical) नुकसान का पहलु निकलता हो

तो इस से परहेज़ किया जाये (बचा जाये) और अगर इस में नुकसान नहीं

तो भी दांत से नाख़ून काटना सहीह नहीं लगता क्यों के नाख़ून में गन्दगी होती है

और गन्दी चीज़ को मन से पकड़ना और दांतों से काटना सहीह नहीं लगता

क्यूंकि नाख़ून में गन्दगी होती है और गन्दी चीज़ को मन से पकड़ना और दांतों से काटना सहीह नहीं है,

ख़ुसूसन (ख़ास तौर से) लोगों के सामने.

 

(13) खड़े खड़े पजामा पहनना:

पजामा खड़े और पड़े दोनों पेहन सटके हैं,

आप को जिसमें आसानी हो उसे इख़्तियार करें.

और किसी पर कोई गुनाह कोई फ़क़्र (गरीबी, Poverty) नहीं शरीअत की जानिब से.

 

(14) औरतों का खड़े खड़े बाल बांधना:

यह कोई मसला नहीं है. इस में एक ही बात एहम है

के औरत अजनबी मर्द के सामने बाल न बंधे. बाक़ी वह खड़े हो कर,

बैठ कर और सो कर किसी भी तरह बाल बांध सकती है.

 

(15) फटे हुए कपड़े जिस्म पर सीना:

फटे हुए कपड़े जिस्म पर होते हुए रफू करना आसान हो तो इस में कोई हर्ज नहीं

और उतारने की ज़रुरत पड़े तो उस सूरत में उसे उतारना ही होगा.

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

Logon Mein Phaili 40 Ghalat Fehmiyan (Part-2)

इस मज़मून (Topic) की पहली क़िस्त (First Part) लिखी गई थी

जिस में एक से लेकर पंद्रह (15) ग़लत फ़हमियों का इज़ाला (Radd) किया गया था.

अब इस का दूसरा पार्ट आप की खिदमत में पेश है.

 

(16) सुबह सूरज निकलने तक सोना:

इन्सान को चाहिए के वह सुबह सवेरे बीदर हो (उठे), फज्र की नमाज़ पढ़े

और फिर रोज़ी की तलाश में निकले. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है:

مَن صَلَّى الصُّبحَ فَهُوَ فِي ذِمَّةِ اللَّهِ

तर्जुमा: जिस ने फज्र की नमाज़ पढ़ी वह अल्लाह के अमान में आ गया.

(सहीह मुस्लिम: 657)

जो बंदह नमाज़ छोड़ कर रोज़ाना ताख़ीर (Late) से उठे

उस की क़िस्मत में बर्बादी ही बर्बादी है क्यों के उस ने अपने रब से अमान उठा लिया,

उस के साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है.

 

(17) दरख़्त के नीचे पेशाब करना:

किसी भी चीज़ के साये (Shadow) में चाहे वो दरख़्त का हो या

किसी और का उस के नीचे पेशाब और पखाने से मना किया गया है.

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है:

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏”‏ اتَّقُوا اللَّعَّانَيْنِ ‏”‏ ‏.‏ قَالُوا وَمَا اللَّعَّانَانِ يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ ‏”‏ الَّذِي يَتَخَلَّى فِي طَرِيقِ النَّاسِ أَوْ فِي ظِلِّهِمْ ‏”‏


तर्जुमा:

लानत का सबब बनने वाली दो बातों से बचो,

साहब ए किराम रज़िअल्लहु अन्हुम ने पुछा:

ए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम!

लानत का सबब बनने वाली वो दो (2) बातें कोनसी हैं? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

एक यह के आदमी लोगों के रास्ते में क़ज़ाए हाजत करे, दूसरे यह के उन के साये की जगह में ऐसा करे.

(सहीह मुस्लिम: 269)

“ताब्रनि ने मोजम अल अवसात” में फलदार दरख़्त के नीचे क़ज़ा ए हाजत की मुमानियत वाली रिवायत ज़िक्र की है,

यह रिवायत ज़ईफ़ है. फलदार दरख़्त, साया वाली मज़्कूरह बाला (ऊपर ज़िक्र की गई) हदीस के ज़िम्न में है

क्यों के आम तौर से हर दरख़्त का साया होता है.

लेकिन जो दरख़्त आम हो और वैसे ही बिला-ज़रुरत (बिना ज़रुरत) आबादी से दूर सुनसान (Lonesome)

जगह पाय पारा हो तो उस के नीचे क़ज़ा ए हाजत में कोई हर्ज नहीं.

 

(18) बैत उल खला में बातें करना:

क़ज़ा ए हाजत के वक़्त बात करना मना है. नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है:

لا يخرجُ الرجلانِ يضربانِ الغائطَ كاشفَينِ عن عوراتِهما يتحدَّثانِ ، فإنَّ اللهَ يمقُتُ على ذلك

तर्जुमा:

दो आदमी क़ज़ा ए हाजत करते हुए आपस में बातें न करें के दोनों एक दूसरे के सत्तर (शर्मगाह) को देख रहे हों

क्यूंकी अल्लाह तआला इस बात पर नाराज़ होता है.

{सहीह अत-तरग़ीब (अल्बानी): 155}

यहाँ सवाल पैदा होता है के आज कल घरों में हम्माम बना होता है तो क्या इस में बातें करना जाएज़ हैi?

हदीस से तो यही पता चलता है के इस हालत में कलाम मना है

के जब दो (2) आदमी नंगे हो कर एक दूसरे को देखते हुए बात करें

लेकिन हम्माम में बात करने की मुमानियत (Preclusion) पर कोई दलील नहीं है. फिर भी बेहतर सूरत

यही है के हमाम में क़ज़ा ए हाजत करते वक़्त बात न करें लेकिन ज़रुरत पड़े या

फिर क़ज़ा ए हाजत से पहले हमाम में दाखिल होते वक़्त बात कर सकता है.

 

(19) उल्टा सोना:

पेट के बल सोना नापसन्दीदाह और मकरूह अमल है,

इस की कराहट (नापसन्दीदगी) की वुजूहात (Reasons) में जहन्नमियों के सोने की मुशाबिहात और जिस्मानी नुकसान वग़ैरा (Etc) हैं,

अल्लाह तआला का फरमान है:

يَوْمَ يُسْحَبُونَ فِي النَّارِ عَلَى وُجُوهِهِمْ ذُوقُوا مَسَّ سَقَرَ

तर्जुमा:

जिस दिन वह अपने मन के बल आग में घसीटे जायेंगे

(और उन से कहा जायेगा) दोज़ख की आग लगने के मज़े चाको.

(सौराह अल-कमर: सौराह न०: 54 आयत न०: 48)

नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“إِنَّ ھٰذِہِ ضِجْعَۃٌ یُبْغِضُھَا اللّٰہُ تَعَالٰی یَعْنِی الْاَضْطِجَاعُ عَلَی الْبَطَنِ”

तर्जुमा:

यक़ीनन इस तरह लेटने को अल्लाह तआला नापसन्द फरमाता है यानी पेट के बल (औंधा) लेटना.

{सहीह अल जमी’(अलबनी): 2271}

अल-इज़तिजाओ अला-अल-बातें “الاضطجاع علی البطن”:

यानी ऐसे सोना के पेट ज़मीन की तरफ और पुष्ट (Back Side) ऊपर की तरफ हो.

इस लिए किसी को पेट के बल नहीं सोना चाहिए मगर ऐसे सोने से ग़रीबी आती है इस का कोई सुबूत नहीं है.

 

(20) क़ब्रस्तान में हसना:

क़ब्रस्तान ऐसी जगह है जहाँ जा कर आख़िरत याद करनी चाहिए इस लिए वहां हसना नापसन्दीदाह अमल है.

वहां बात करते हुए या यूँ ही हंसी आ गई तो इस में कोई हर्ज नहीं, और इस से रिज़्क़ पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

 

(21) पीने का पानी रात में खुला रखना:

खाने पीने का बर्तन रात में खुला रखने से ग़ुरबत नहीं आती,

अलबत्ता सोते वक़्त उन बर्तनो को ढक दें जिन में खाने पीने की चीज़ें हों. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है:

أَطْفِئُوا الْمَصَابِيحَ إِذَا رَقَدْتُمْ، وَغَلِّقُوا الأَبْوَابَ، وَأَوْكُوا الأَسْقِيَةَ، وَخَمِّرُوا الطَّعَامَ وَالشَّرَابَ ـ وَأَحْسِبُهُ قَالَ ـ وَلَوْ بِعُودٍ تَعْرُضُهُ عَلَيْهِ

तर्जुमा: नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: जब सोने लगो तो चैराग बुझा दो,

दरवाज़े बंद कर दो, मश्कजी (वाटर स्किन्स) का मुंह बांध दो और खाने पीने के बर्तनो को ढांप दो.

हज़रत जाबिर रज़िअल्लहु अन्हु ने कहा के मेरा ख्याल है के ये भी कहा खुवाह लकड़ी ही के ज़रिये से ढक सको जो उसकी चौड़ाई में बिस्मिअल्लह कह कर रख दी जाये.

(सहीह बुखारी: 5624)

एक दूसरी रिवायत इस तरह है:

غَطُّوا الإِنَاءَ وَأَوْكُوا السِّقَاءَ فَإِنَّ فِي السَّنَةِ لَيْلَةً يَنْزِلُ فِيهَا وَبَاءٌ لاَ يَمُرُّ بِإِنَاءٍ لَيْسَ عَلَيْهِ غِطَاءٌ أَوْ سِقَاءٍ لَيْسَ عَلَيْهِ وِكَاءٌ إِلاَّ نَزَلَ فِيهِ مِنْ ذَلِكَ الْوَبَاءِ

तर्जुमा:

बर्तन ढक दो, मश्कजी (वाटर स्किन्स) का मुँह बंद करो,

इस लिए के साल में एक रात ऐसी आती है जिस में बला (Pestilence) नाज़िल होती है,

और जिस चीज़ का मुंह बंद न हो और जो बर्तन ढाका होवा न हो उस में यह बाबा (Pestilence) उतर पड़ती है.

(सहीह मुस्लिम: 2014)

बर्तन खुला चोरनी से गरीबी अन्य वाली बात शिया क़ुतुब (Books) से मन्क़ूल (आयी है) है,

उस की किताब में लिखा है के बीस (20) आदतें ऐसी हैं जिन से रिज़्क़ में कमी आती है,

उन में से एक पानी के बर्तन का ढकना खुला रखना है.

{बिहार उल अनवर (मोहम्मद बक़र मजलसि) जिल्द: 73, पेज: 314 हदीस: 1)

(22) रात में सवाली को कुछ न देना:

यह बात भी शिया क़ुतुब (Books) से आयी है,

और यह बात हज़रत अली रज़िअल्लहु अन्हु की तरफ मंसूब की जाती है

जिस की कोई हकीकत नहीं.

 

(23) बुरे ख़यालात करना:

इन्सान गुनाहों का पुतला है, उस से हमेशा गलती होती रहती है.

उस के दिमाग़ में बुरे ख़यालात आते रहते हैं. एक मुस्लिम का काम है

के वह उन बुरे ख़यालात से तौबा करता रहे और उन पर अमल करने से बचे.

अल्लाह तआला अपने बन्दों पे बोहत मेहरबान है वह बन्दों के दिल में पैदा होने वाले

बुरे ख़यालात पे पकड़ नहीं करता जब तक के उस पर अमल न करे.

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ “‏ إِنَّ اللَّهَ تَجَاوَزَ عَنْ أُمَّتِي مَا حَدَّثَتْ بِهِ أَنْفُسَهَا، مَا لَمْ تَعْمَلْ أَوْ تَتَكَلَّمْ

तर्जुमा:

हज़रत अबु हुरैरा रज़िअल्लहु अन्हु से रिवायत है के

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

बेशक अल्लाह तआला ने मेरी उम्मत से उस वक़्त तक दरगुज़र (माफ़) कर दिया है

(उस चीज़ को) जो उस के दिल में (बुरा) ख़याल पैदा होता है जब तक के उस पर अमल न करे या बोल न दे.

(सहीह बुखारी: 5269 और सहीह मुस्लिम:127)

इस लिए यह बात कहना गलत है के बुरे ख़यालात से गरीबी आती है,

अलबत्ता एक बात यह कही जा सकती है के बुराई और फहश काम करने से ग़ुरबत आ सकती है

. अल्लाह तआला का फरमान है:

الشَّيْطَانُ يَعِدُكُمُ الْفَقْرَ وَيَأْمُرُكُم بِالْفَحْشَاءِ

तर्जुमा: शैतान तुम्हें फ़क़ीरी से धमकाता है और बेहयाई का हुक्म देता है.

(सौराह बक़रह: सौराह न०: 2 आयत न०: 268)

(24) बग़ैर वुज़ू के क़ुरआन मजीद पढ़ना:

अफ़ज़ल यही है के वुज़ू करके क़ुरआन की तिलावत करे लेकिन बग़ैर वुज़ू के भी मुशफ से तिलावत करना जाएज़ है

इस लिए यह बात कहना बिल्कुल गलत है के बग़ैर वुज़ू के क़ुरआन मजीद पढ़ने से ग़रीबी आती है.

 

(25) इस्तिंजा करते वक़्त बातें करना:
आज कल घरों में बैत उल खला बने होते हैं और आदमी पर्दे में होता है,

इस लिए ज़रुरत के तहत इस्तिंजा और क़ज़ा ए हाजत के वक़्त कलाम करने में कोई हर्ज नहीं है.

इस सिलसिले में एक हदीस आती है:

لا يخرجُ الرجلانِ يضربانِ الغائطَ كاشفَينِ عن عوراتِهما يتحدَّثانِ ، فإنَّ اللهَ يمقُتُ على ذلك

तर्जुमा:

दो मर्दों के लिए ये जाएज़ नहीं है के वो बैत उल खला के लिए निकलें,

तो अपनी अपनी शर्मगाह खुली रख कर आपस में बातें करने लगें, क्यूंकि अल्लाह तआला इस बात पर नाराज़ होता है.

{सहीह अत-तरग़ीब (अल्बानी): 155}

इस हदीस में क़ज़ा ए हाजत के वक़्त बात करने की मुमानियत दो बातों के साथ है.

पहली बात: दोनों बात करने वाले आदमी अपनी शर्मगाह खोले हुए हों.

दूसरी बात: वह दोनों एक दूसरे को देख रहे हों.

यूँही (बिना ज़रुरत) इस्तिंजा और क़ज़ा ए हाजत के वक़्त बात करना मकरूह है मगर ज़रुरत के तहत (वक़्त) बात कर सकते हैं.

शेख इब्न ए उठाइमीन रहिमहुल्लाह से सवाल किया गया के क़ज़ा ए हाजत से पहले हमाम के अन्दर बात करने का क्या हुक्म है?

तो शैख़ ने जवाब दिया: इस में कोई हर्ज नहीं है, ख़ास तौर से उस वक़्त जब कोई ज़रुरत हो,

क्यूंकि इस की मुमानियत की कोई सराहत (वज़ाहत) नहीं है सिवाए इस सूरत के जब दो आदमी एक दूसरे के पास बैठ के पाखाना करें और दोनों

बातें करें. और मुजर्रद (सिर्फ) क़ज़ा ए हाजत वाली जगह के अन्दर से कलाम करने की मुमानियत नहीं है.

 

(26) हाथ धोये बग़ैर खाना खाना:

खाने से पहले हाथ धोना जाऊरी नहीं है, रिवायात से पता चलता है के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हाथ धोये बग़ैर भी खाना खाया है. खाना

खाने से पहले हाथ धोनी वाली कोई रिवायत सहीह नहीं है सिवाए एक रिवायत के जो नसाई में है.

عَنْ عَائِشَةَ، رضى الله عنها أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا أَرَادَ أَنْ يَنَامَ وَهُوَ جُنُبٌ تَوَضَّأَ وَإِذَا أَرَادَ أَنْ يَأْكُلَ غَسَلَ يَدَيْهِ

तर्जुमा:

हज़रत ऐसा रदिअल्लहु अन्हा से रिवायत है

उन्होंन न बयान किया के रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब भी सोने का इरादह करते

और आप हालत ए जनाबत में होते तो वुज़ू करते और जब खाने का इरादह करते तो अपने दोनों हाथ धोते.

(सुनें नसाई: 257 और 258)

इस हदीस को शेख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने सहीह क़रार दिया है.

इस रिवायत में मुतलक़ हाथ धोनी का ज़िक्र नहीं है बल्की जनाबत से मुताल्लिक़ है,

इस लिए यह कहा जायेगा के अगर हाथ में गन्दगी लगी हो तो खाने से पहले हाथ धो लेना चाहिए वरना ज़रुरत नहीं है.

और इस से मुताल्लिक़ ग़ुरबत वाली बात झूटी है.

 

(27) अपनी औलाद को कोसना:

औलाद की तरबियत वालिदैन के ज़िम्मा है, माँ बाप बच्चों की तरबियत के लिए दांत सकते हैं, कोस सकते हैं,

बल्के मार भी सटके हैं क्यूंकि बच्चों के सिलसिले में अहम चीज़ उन की तरबियत है.

तरबियत की ग़र्ज़ (मक़सद) से बच्चों को मारने का हुक्म हमें इस्लाम ने दिया है:

مُرُوا أَوْلاَدَكُمْ بِالصَّلاَةِ وَهُمْ أَبْنَاءُ سَبْعِ سِنِينَ وَاضْرِبُوهُمْ عَلَيْهَا وَهُمْ أَبْنَاءُ عَشْرِ سِنِينَ وَفَرِّقُوا بَيْنَهُمْ فِي الْمَضَاجِعِ

तर्जुमा:

जब तुम्हारी औलाद सात (7) साल की उम्र को पहुंच जाएँ तो उन्हें नमाज़ का हुक्म दो

और जब वह दस (10) साल के हो जाएँ तो (नमाज़ में कोताही करने पर) उन्हें सजा दो,

और बच्चों के सोने में तफ़रीक़ कर दो.

(सुनें अबु दावूद: 495)

अल्लामा अलबनी रहिमहुल्लाह ने सहीह उल जमी’: 5868 में सहीह कहा है)

इमाम शाफ़ई रहिमहुल्लाह कहते हैं: बापों और माओं की ज़िम्मेदारी (Responsibility) है

के वह अपनी औलादों को अदब सिखाएं. तहारत और नमाज़ की तालीम दें

और बाशौर (Sentient) होने के बाद (कोताही की सूरत में) उन की पिटाई करें.

(शरह अल सुन्नाह: 2 / 407)

(28) दरवाज़े पर बैठना:

दरवाज़ा से लोगों का आना जाना होता है, इस लिए अदब का तक़ाज़ा है

के दरवाज़े पे न बैठे, नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हुक्म फ़रमाया है के रास्ते को हक़ दो.

लेकिन अगर अपना घर हो, लोगों का आना जाना न हो तो फिर अपने घर के दरवाज़े पे बैठने में कोई हर्ज नहीं है.

फरिश्ते जुमा के दिन मस्जिद के दरवाज़े पे खड़े रहते हैं.

إِذَا كَانَ يَوْمُ الْجُمُعَةِ كَانَ عَلَى كُلِّ باب مِنْ أَبْوَابِ الْمَسْجِدِ الْمَلاَئِكَةُ، يَكْتُبُونَ الأَوَّلَ فَالأَوَّلَ، فَإِذَا جَلَسَ الإِمَامُ طَوَوُا الصُّحُفَ وَجَاءُوا يَسْتَمِعُونَ الذِّكْرَ ‏”

तर्जुमा:

नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: जब जुमा का दिन होता है

तो फरिश्ते मस्जिद के हर दरवाज़े पर खड़े हो जाते हैं, पहले अन्य वाले का नाम पहले,

उस के बाद अन्य वाले का नाम उस के बाद लिखते हैं (इसी तरह अन्य वालों के नाम उन के आने की तरतीब से लिखते रहते हैं).

जब इमाम खुत्बा देने के लिए (मिम्बर) पर बैठ जाता है तो फरिश्ते अपने रजिस्टर (जिन में आने वालों के नाम लिखे गए हैं)

को लपेट देते हैं और खुत्बा सुनने में मशग़ूल हो जाते हैं.

(सहीह मुस्लिम: 850 And सहीह बुखारी: 3211)

दरवाज़े पर फर्श बिछाने से मुताल्लिक़ हज़रात अनस रज़िअल्लहु अन्हु से मरवी रिवायत ज़ईफ़ है:

عَنْ أَنَسٍ قَالَ: “نَهَى رَسُولُ اللَّهِ – صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ – أَنْ يُفْرَشَ عَلَى بَابِ الْبُيُوتِ، وَقَالَ: نَكِّبُوهُ عَنِ الْبَابِ شيئًا

إتحاف الخيرة المهرة بزوائد المسانيد العشر

इस की सनद में मूसा बिन मोहम्मद बिन इब्राहिम अत-टाइम ज़ईफ़ रवि है, इस लिए यह हदीस न क़ाबिल ए ऐतबार है.

 

(29) लहसुन (Allium) पियाज़ (Onion) के छिलके (Peels) जलना:

यह बात भी शिया से मन्क़ूल है, उन की किताब जमी’ अल अखबार (الجامع الاخبار) में मज़कूर है

जिसे बाज़ (कुछ) सूफियों ने अपनी किताब में ज़िक्र कर दिया और लोगों में मशहूर हो गयी.

इस बात को तुर्कीस्तान के हनफ़ी अलीम बुरहानुद्दीन जर्नोजी ने अपनी किताब

“تَعْلِیْمُ الْمُتَعَلِّمِ طَرِیْقُ التَّعَلِّم” में ज़िक्र किया मगर इस्लाम में इस बात की कोई हकीकत नहीं है.

 

(30) फ़क़ीर से रोटी या फिर और कोई चीज़ खरीदना:

यह बात भी शिया की किताब जमी अल अखबार (الجامع الاخبار) में मौजूद है.

फ़क़ीर तो खुद ही मोहताज होता है वह क्यों किसी से कुछ बेचेगा और

अगर उस के पास कोई क़ीमती सामान है तो उसे बैच सकता है.

फ़क़ीर से कुछ खरीदना ग़रीबी का सबब हो तो कोई फ़क़ीर मालदार नहीं हो सकता

और फ़क़ीर से खरीदने वाला कोई मालदार नहीं रह सकता. अक़ल और नक़ल दोनों ऐतबार से यह झूटी बात है.

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

लोगों में फैली 40 गलतफहमियां (Last Part)

(31) फूँक से चैराग बुझाना:

यह बात शिया किताब “जमे’ अल अखबार” से मन्क़ूल है जो हमारे लिए हुज्जत नहीं है.

चैराग तो फूँक से ही बुझाया जाता है, कोई दूसरे तरीके से बुझाये इस में भी कोई हर्ज नहीं लेकिन फूँक से चिराग बुझाने से गरीबी आती है यह सहीह नहीं है.

 

(32) बिस्मिल्लाह पढ़े बग़ैर खाना:

खाना खाते वक़्त बिस्मिल्लाह कहना वाजिब है:

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِذَا أَكَلَ أَحَدُكُمْ فَلْيَذْكُرْ اسْمَ اللَّهِ تَعَالَى فَإِنْ نَسِيَ أَنْ يَذْكُرَ اسْمَ اللَّهِ تَعَالَى فِي أَوَّلِهِ فَلْيَقُلْ بِسْمِ اللَّهِ أَوَّلَهُ وَآخِرَهُ

तर्जुमा:

ऐसा रज़िअल्लाहु अन्हा से रिवायत है के रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया:

जब तुम में से कोई खाना खाये तो अल्लाह का नाम ले, और अगर अल्लाह तआला का नाम लेना शुरू में भूल जाये तो कहे: بِسْمِ اللَّهِ أَوَّلَهُ وَآخِرَهُ

(अबू दावूद: 3767) सहीह

वाक़ई बिस्मिल्लाह के बग़ैर खाना खाना नुकसान और खसरे (Ghaatey) का बाईस (Reason) है,

उस के खाने में शैतान शामिल हो जाता है इस लिए यह कहा जा सकता है

के अल्लाह के ज़िक्र के बग़ैर मुस्तक़िल खाना खाने से वह खाने की नेमत और उस की बरकत से महरूम हो जायेगा

लेकिन अगर भूल से ऐसा हो जाये तो अल्लाह तआला ने भूल चूक को माफ़ कर दिया है.

 

(33) गलत क़सम खाना:

इस्लाममें झूटी क़सम खाना गुनाह-ए-कबीरह है नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है:

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏”‏ الْكَبَائِرُ الإِشْرَاكُ بِاللَّهِ، وَعُقُوقُ الْوَالِدَيْنِ ‏”‏‏ أَوْ قَالَ ‏”‏ الْيَمِينُ الْغَمُوسُ ‏”‏‏

तर्जुमा: अब्दुल्लाह बिन अम्र रदिअल्लहु अन्हुमा से रिवायत है

की नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया:

कबीरह गुनाह यह हैं अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना,

वालिदैन की नाफरमानी करना या फ़रमाया की नाहक़ दूसरे का माल लेने के लिए झूटी क़सम खाना.

(सहीह बुखारी: 6870)

 

ऐसेलोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है इस लिए एक मुस्लमान को क़तई तौर पर झूटी क़सम नहीं खानी चाहिए.

अगर किसी ने साबिक़ा (Pichle) किसी मुआमले पर आमदन (Jaan Boojh Kar) झूटी क़सम खाई है तो सच्ची तौबा करे

अगर झूटी क़सम के ज़रिये किसी का हक़ मारा हो तो उस को उसका हक़ वापस करे

और अगर अंदाह किसी काम के न करने पर क़सम खाई और वह काम कर लिया तो क़सम का कफ़्फ़ारा अदा करे.

इस का कफ़्फ़ारा दस(10) मिस्कीनों को औसत (Darmiyaani) दर्जे का खाना खिलाना है जो अपने घर वालों को खिलते हों

या इसी तरह उन मिस्कीनों को कपड़े देना है या एक गर्दन यानी ग़ुलाम या बंदी को आज़ाद करना है.

जिसे यह सब कुछ न मिले तो वह तीन दिन रोज़ा रखे.

 

(34) जूता चप्पल उल्टा देख कर सीधा नहीं करना:

इस्लामी ऐतबार से इस बात की कोई हकीकत नहीं है.

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के ज़माने में भी जूता था मगर आप से,

सहाबा-ए-किराम से या चारों इमाम से इस क़िस्म की कोई बात मन्क़ूल नहीं है.

इब्न-ए-अक़ील हंबली ने किताब “अल-फुनूँ ” में लिखा है:

والویل لمن رأوه أكب رغیفا على وجهه،أو ترك نعله مقلوبة ظهرها إلى السماء۔

(الآداب الشرعیة1 /268-269)

तर्जुमा:

बर्बादी है उस के लिए जिस ने उलटी हुए रोटी देखि या पलटा होवा जूता जिस की पीठ आसमान की तरफ हो उसे छोढ़ दिया.

(अल-आदाब अल-शरिययह : 1/268-269)

इस कलाम में बोहत सख्ती है, क़ुरान और हदीस की रौशनी में इस कलाम की कोई हैसियत नहीं रहती.

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जूते में नमाज़ पढ़ते थे:

سَعِيدُ بْنُ يَزِيدَ الأَزْدِيُّ قَالَ سَأَلْتُ أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ أَكَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي فِي نَعْلَيْهِ قَالَ نَعَمْ

तर्जुमा:

सईद बिन यज़ीद अल-आज़ादी कहते हैं की मैंने अनस बिन मालिक रदिअल्लहु अन्हु से पुछा

की क्या नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने जूतों में नमाज़ पढ़ते थे ? उन्हों ने कहा: हाँ.

(सहीह बुखारी: 386 and 5850)

ज़ाहिर सी बात है जूते में नमाज़ पढ़ते हुए जूता पलटेगा.

इस लिए उल्टे जूते के मुताल्लिक़ मज़्कूरह बाला (Upar Zikr Ki Hue) बातें करना ठीक नहीं है

अलबत्ता यह कह सटके हैं के चुके जूते के निचले हिस्से में गन्दगी लगी होती है

इस वजह से उल्टे जूते को पलट दिया जाये ताकय लोग उस से गहिन न महसूस करें.

 

(35) हालात-ए-जनाबत में हजामत करना:

हालत-ए-जनाबत में मर्द और औरत के लिए महज़ (Sirf) चाँद (Kuch) चीज़ें मन हैं,

उन में नमाज़, तवाफ़, मस्जिद में क़ियाम और क़ुरान की तिलावत वग़ैरा हैं बाक़िया दूसरे काम जुनूबी अंजाम दे सकता है.

हालत-ए-जनाबत में हजामत को फ़क़ीरी और गरीबी का सबब बतलाना गिर इस्लामी नजरिया है.

 

(36) मकड़ी का जला घर में रखना :

यह बात भी बातिल और मरदूद है .

इस बात की निस्बत हज़रात अली रदिअल्लहु अन्हु की तरफ की जाती है :

طهّروا بیوتكم من نسیج العنكبوت ، فإنّ تركه فی البیوت یورث الفقر

तर्जुमा :

घरों को मकड़ी के जालों से साफ़ रखा करो किउनके मकड़ी के जालों का घर में होना फ्लॉस (Gareebi) का बाइस (Sabab) है .

यह बात “तफ़्सीर ए सालबी ” और “तफ़्सीर ए क़ुर्तुबी ” के हवाले से बयां की जाती है

मगर उस की सनद में “अब्दुल्लाह बिन मैमून अल -क़द्दाह ” मतरूक मुत्तहम बिल -काज़िब रवि है .

(तहज़ीब अत -तहज़ीब : 6/44, 45)

(37) रात को झाड़ू लगाना :

रात हो या दिन किसी भी वक़्त झाड़ू लगा सकते हैं , इस की मुमानियत की कोई दलील नहीं है

न ही इस काम से मासियत (Nafarmani) होती है .

इस लिए रात को झाड़ू देना तंगदस्ती का सबब बतलाना तवह्हुम परस्ती और जेएफ ऐतेक़ादि है .

मुस्लमानूँ में बारेल्ली तब्क़ा इस तवह्हुम का शिकार है . अल्लाह तआला इन्हें हिदायत दे .

 

(38) अंधेरे में खाना :

वैसे उजाले में खाये तो अच्छा है मगर किसी को उजाला न मिल सके तो अंधेरे में खाने में कोई हर्ज नहीं है .

सौराह हश्र में एक अंसारी सहाबी का ज़िक्र है जिन्हों ने अपने मेहमान नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को

अंधेरे में मेहमानी कराइ बावजूद ये के चैराग मौजूद था मगर उन्हों ने बीवी को चैराग बुझाने के लिए कहा

ताकय अंधेरे में मेहमान शिकम सैर हो कर (Pait Bhar Kar) खाये और मेज़बान भूका रहे . इस मंज़र को अल्लाह ने बयां करते हुए फ़रमाया :

وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰ أَنْفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ

तर्जुमा :

वह अपने ऊपर Dosron Ko तरजीह देते हैं जो खुद को कितनी ही सख्त हाजत हो .

(सौराह अल -Hashr, सौराह न० : 59 आयात न ० : 9)

(39) घड़े में मुँह लगा कर पीना:

पानी का कोई भी बर्तन हो अगर मुँह लगा कर पीना आसान हो,

उस का हजम (Volume, Size) बड़ा न या उस का दहन (Muh) कुशादः

न हो जिस से मुँह में मिक़्दार से ज़ियादा पानी जाने का खतरा न हो तो बर्तन से मुँह लगा कर पिया जा सकता है .

मुत्तफ़ाक़ अलैह (Means Bukhari or Muslim Ki) एक रिवायत में मश्कजी से मुँह लगा कर पानी पीने की मुमानियत है:

عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا، قَالَ: نَهَى النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَنِ الشُّرْبِ مِنْ فِي السِّقَاءِ

तर्जुमा:

हज़रात इब्न ए अब्बास रज़िअल्लाहु अन्हुमा ने बयान किया

की नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मश्कजी के मुँह से पानी पीने को मन किया था .

(सहीह बुखारी: 5629)

इस के अलावह एक दूसरी हदीस है जिस से साबित हो रहा है

की नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मश्कजी में मुँह लगा कर पानी पिया है:

عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي عَمْرَةَ، عَنْ جَدَّتِهِ، كَبْشَةَ قَالَتْ دَخَلَ عَلَىَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَشَرِبَ مِنْ فِي قِرْبَةٍ مُعَلَّقَةٍ قَائِمًا فَقُمْتُ إِلَى فِيهَا فَقَطَعْتُهُ

तर्जुमा:

काबशाह रज़िअल्लाहु अन्हा कहती हैं: रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मेरे घर तशरीफ़ लाये,

आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने खड़े खड़े लटकी हुए मशकीज़ह के मुँह से पानी पिया,

फिर में मशकीज़ह के मुँह के पास गई उस को काट लिया.

(तिरमिधि : 1892)

हसन खुलासा के तौर पर यह कहना चाहूंगा के बर्तन छोटा हो तो

उस में मुँह लगा कर पानी पियें, बड़ा हो तो दूसरे छोटे बर्तन में उंडेल कर पियें

और अगर बड़े बर्तन से पीने की ज़रुरत पढ़ जाये तो इस में कोई हर्ज नहीं.

 

(40) क़ुरान मजीद न पढ़ना:

क़ुरान पढ़ने और अमल करने की किताब है जो उस से दूरी इख़्तियार करता है वह वाक़ई

अल्लाह की रेहमत से दूर हो जाता है. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने क़ुरान पढ़ने का हुक्म दिया है

इस से ईमान में ज़ियादती, इल्म और अमल में पुख्तगी (मज़बूती) और ज़िन्दगी की तमाम चीज़ में बरकत आती है.

इस लिए क़ुरान पढ़ने का मामूल बनायें और समझ कर पढ़ें.

जो बिना समझे पढ़ते हैं वह क़ुरआन के नुज़ूल के मक़सद से बेख़बर और तिलावत के आदाब से न-वाक़िफ़ हैं।

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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