आशिक़ व माशूक़ का तोहफा देना (ज़िना की) रिश्वत है

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Aashiq Wa Mashuq Ka Tohfa Dena (Zinaa Ki) Rishwat Hai
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Aashiq Wa Mashuq Ka Tohfa Dena (Zinaa Ki) Rishwat Hai

आशिक़ व माशूक़ का तोहफा देना (zinaa Ki) रिश्वत है

सवाल: आशिक़ व माशूक़ एक दूसरे को तोहफा देते है इसका क्या हुक्म है?

जवाब: अव्वल तो दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी ही है, और गैर-महरम भी इस वजह से दोनों का मिलना, बात करना, एक दूसरे को देखना

ये सब गुनाह है और तोहफा देना सख्त मन (रिश्वत है), गुनाह-ए-कबीरा, हराम और जहन्नम में ले जाने वाला काम है. “अल बाहृररैंक” में है

की, “आशिक़ व माशूक़ का एक दूसरे को तोहफा देना (जीना की) रिश्वत है, और उसका वापस करना वाजिब है”.

(अल बाहृररैंक, जिल्द 6, सफ़ा न०, 441)

सवाल: औरत अपने नामहरम रिश्तेदार मसलन बहनोई, खालु, फूफा वगैरह को निय्यत-ए-सलेहा के साथ किसी महरम के ज़रिये तोहफे

भिजवा सकती है या नहीं?

जवाब: नहीं भिजवा सकती, तोहफे की तासीर अजीब होती है. हदीस-ए-पाक में है की तोहफा अक़लमंद व दाना को अँधा कर देता है.

(अल फिरदौस बी माँ सुरील खत्ताब, जिल्द 4, सफ़ा न० 335, हदीस न० . 6969)

एक और हदीस-ए-मुबारक में है की, “तोहफा दो मोहब्बत बढ़ेगी”,

(अस्सुनानुल कुबरा लील बइहाकि, जिल्द 6, सफ़ा न० . 280, हदीस न०. 11946)

बहार-हाल औरत को अपने नामहरम रिश्तेदार के दिल में मुहब्बत की झड़े उस्तवार करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती.

मफ़हूम-ए-हदीस: इमाम बुखारी ने सय्यिदना उम्र बिन अब्दुल अज़ीज़ (रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत की है

की रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया –

“सौगाद तो सौगाद है पर किसी (गैर) लड़की को देना रिश्वत है”. (रिश्वत इसलिए कहा गया है की ये दिलो में मुहब्बत पैदा करने का जरिया है,

और गैर मर्द का गैर औरत से मुहब्बत पैदा होना शरीअत के खिलाफ और गुनाह है, इस हाल में ये तोहफा एक रिश्वत का काम भी करेगा)

(सहीह बुखारी, सफ़ा न०. 174, जिल्द 2)

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