क्या हम अब भी जज़्बात में बह जाते हैं?

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 Kya ham ab bhi jazbaat mein bah jate hain
sallallahu alaihi wasallam
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Kya ham ab bhi jazbaat mein bah jate hain

क्या हम अब भी जज़्बात में बह जाते हैं

में जब लोगों को देखता हूँ, मशरिक़ में उनसे मिलता हूँ तो मुझे ये महसूस होता है के इन की ज़्यादा दिलचस्पी का बा-इस इल्मी माबाहिस

(इल्मी Debates) बन कर रह गई हैं।

ये अपनी जगा बड़ी क़ीमती चीज़ है लेकिन जब हम क़यामत में अपने रब्ब की बारगाह में उठी गईं तो इस में सवालात इस के मुताल्लिक़ नहीं

होंगे यानी अल्लाह तआला ये नहीं पूछे गा के यह बताओ तुम मेराज को जिस्मानी मानती थे या रूहानी, ये नहीं पूछेंगे के बताओ क़ुरान

मजीद की फलां आयात से तुमने ये मतलब निकाला था या वो मतलब समझा था

वहाँ जो चीज़ ज़ैर ए बहस अन्य वाली है दीन में असलान उस पर निगाह रहनी चाहिए, ये सब इल्म को हासिल करने की चीज़ें हैं, इस से इंसान

तासुबात को खत्म करता है, इसके इल्म मैं इज़ाफ़ा होता है. नयी नयी दुन्याएँ दरयाफ्त करता है. इसको एक क़ल्बी इत्मीनान हासिल होता है,

ये बड़ी क़ीमती चीज़ है. इल्म का सफर कोई मामूली सफर नहीं है. लेकिन असल चीज़ जिस के ऊपर निगाह रेहनी चाहिए वो ये है के मैं अपनी

ज़ात में, अपनी शक्शियत में पाकीज़गी का सफर तय कर रहा हूँ या नहीं, ये सवाल हर वकत सामन्य रहना चाहिए, ये मै थोड़ी देर बाद

बताऊंगा की पाकीज़गी से क़ुरान क्या मुराद लेता है।

क्यों के क़ुरान ए मजीद से यही मालूम होता है के अल्लाह तआला ने जिस इम्तेहान में हमको मुब्तला किया है, इस इम्तेहान में हदफ़

(Aim, goal) की कैफियत यही है के हम कितना पाकीज़ा हो कर उसकी बारगाह में जाते हैं,

मैं आगे चल कर वज़ाहत करूंगा के पाकीज़गी का (Content) क्या है लेकिन इस वकत जिस चीज़ की तरफ असल में तवज्जोह दिलानी

मक़सूद है वो ये है के इस हदफ़ को कभी निगाह से ओझल नहीं होना चाहिए.

इल्मी बहसें (debates) करे, चीज़ों को समझे, नयी नयी पहलु सामने आये. उन से फ़ायदा उठाये. इन मैं से कोई चीज़ ऐसी नहीं के जिसको ग़लत कहा जा

सके. लेकिन अगर यही तमान चीज़े हदफ़ हो कर रह गई है तो ये समझले की दीन महज़ इल्म नहीं है वो असलान एक बड़ी मंज़िल है जिसकी

तरफ हमारी रहनुमाई करने के लिए नाज़िल किया गया है. और जैसा के मैनी बताया है के वो तज़किया (Purification of oneself) है और

ये क़ुरान-ए-मजीद ने बिलकुल वाज़ेह बता दिया के:

“Qad Aflaha Man Tazakka”

“जिस ने अपनी आपको पाकीज़ा कर लिया, वही फलाह पायेगा”

(क़ुरआन, 87:14)

और पाकीज़गी के लिए अल्लाह ने पूरा अमल भी बता दिया है के क्या करना चाहिए. मैं इस पर भी गुफ्तगू करूंगा आगे चल कार

इस में चुकी इल्म से बात शुरू हुई है तो अगर आप खालिस नस्ब-उल-ऐन (मकसद) के हवाले से देखें तो जो “रवैय्या” इस से वजूद मैं आता है

वो है जिस के बारे में हम क़यामत में जवाब-देह होंगे. यानी नतीजा (Result Of Our Research) नहीं बल्कि वो रवैया (Attitude) जो

हमनी इख्तयार किया. इल्म का तज़किया (Purification) भी उसी तरह मतलूब (Zarurat) है जिस तरह अमल का तज़किया मतलूब है

लेकिन इल्म के तज़किये में हदफ़ (Aim) क्या है?

यानी हमारा “Attitude Towards नॉलेज” क्या है?

यानी हमने इल्म के मुआमले मैं रवैया क्या इख्तयार किया है?

क्या हमने अपने आपको तासुबात (बदगुमानी या बिना-तहक़ीक़ के किसी नतीजे पर पोह्चन) से पाक करने की कोशिश की है?

देखें मैनी लफ्ज़ बोलै पाक करना यही तज़किया है.

क्या हम अब भी जज़्बात मैं बह जाते हैं?

क्या अब भी हम उसी जगह पर खड़े हैं के पहली अगर एक शख्स की अक़ीदत (अंधी-तक़लीद; Blind-following) मैं मुब्तला थे तो अब

किसी दूसरे शख्स की अक़ीदत मैं मुब्तला हो गये हैं? मिसाल के तौर पर क्या पहले अगर हम इमाम अबू हनीफा की तक़लीद करते थे तो क्या

अब किसी और इमाम या अपने फ़िरक़े के उलेमा या किसी मुहद्दिस की तक़लीद करते है? क्या क़ुरआन और सुन्नत से अगर कोई बात

साबित हो जाती है तो क्या फिर भी हम ये देखते है की हमारे उलेमा या मुहद्दिस की राये क्या है? क्या अपने उलेमा और मुहद्दिस को हम

क़ुरआन और सुन्नत से ज़्यादा Priority देते है?

ये वो जायज़ा है जो हम मैं से हर शख्स को हर वकत लेते रहना चाहिए यानी अगर अपने कोई नई तेहतीक जान ली या कोई नई राये मालूम

कर ली तो इस से आप फ़ायदा उठायेगें. तो वो आपको इत्मीनान-ए-क़ल्ब देगी लेकिन जिस चीज़ के लिए आप अल्लाह तआला के हुज़ूर

जवाब-दे हैं वो ये के जब ये चीज़ आप के सामने आयी या इस से मुख्तलिफ कोई चीज़ आपके सामने आयी तो अपने रवैया क्या इख्तयार किया?

मिसाल के तौर पर, क़यामत में ये सवाल नहीं होगा की आप रफा यादें कर के नमाज़ पढ़ते थे या बिना रफयदैन कर के लेकिन ये ज़रूर सवाल

होगा की जब आपके पास ये हदीश पोहच गयी थी की रसूलल्लाह हमेशा रफा यादें कर के नमाज़ पढ़ते थे तो अपने इस हदीस पर अमल

क्यों नहीं किया?

तो जिस चीज़ की इस्लाह इल्म की दुनिया मैं भी पेश ए नज़र रेहनी चाहिए वो ये है के हर तरह के तासुबात, हर तरह के जज़्बात, अक़ीदतों से

बालातर (अलग) हो के चीज़ों को समझने की तरबियत कर लें यानी इस दीन की राह मैं तरबी’यत का पहला मर’हाला यही है के हमारा हदफ़

यही हो के हम अपना जायज़ा लेते रहे

हर रात जब हम बिस्तर पर जाये तो सोने से पहले एक बार खुद से पूछें के क्या वाक़ई हम टा ’सुबाट (बद-गुमानी; अपने से अलग राये रखने

वाले के लिए बाद -गुमानी ) से बला’तर हो गए हैं? और इस मैं हमेशा ये चीज़ पेश’ नज़र रखें के ता ’सुब एक ऐसी बिमारी है के ये बाज़ औक़ात

आदमी को एहसास भी नहीं होता के यह इस को लाहक़ हो चुकी है (लग गई है). जज़्बात से मग़रूब’यत (खुद को जज़्बात के हवाले कर देना)

इंसान की ऐसी कमज़ोरी है के बड़े से बड़े आदमी को ये अंदाज़ा नहीं होता के वो इस कमज़ोरी मैं मुब्तला हो चूका है. तोह अपना पोस्टमॉर्टेम

करते रहना चाहिए, यानी जायज़ा लेते रहना चाहिए के

क्या इस इल्म क सफर मैं वाक़ई अब हम खालिस दलील की बुन्याद पर चीज़ो को समझते हैं?

अगर कोई हमारी मानी हुई रा ’ये से मुख्तलिफ चीज़ की तरफ हमें बुलाये तो हमारा रेस्पॉन्स गैर तास्सुबाना होता है?

क्या हम आज भी पूरी तवज्जोह से उसकी बात सुनने के लिए अमादा हो जाती हैं?

क्या हमारी अंदर ये चीज़ मौजूद है के अगर हमारी ग़लती हम पर वा ’ज़ेह की जएगी तोह हम हक़ को मान लेंगे?

तो इसका जायज़ा लेते रहना चाहिए. ये पहली चीज़ है जो में आपकी खिदमत मैं अर्ज़ करना चाहता था.

ये पहली चीज़ है जो में आपकी खिदमत मैं अर्ज़ करना चाहता था के जब आप इल्म का सफर करें तो आम तोर पर इंसान नाता ’इज फ़िक्र

(conclusion of a research) में मुब्तला होजाता है के यह एक तहक़ीक़ हो गई, एक नुक़्ता-नज़र वाज़ेह हो गया.

ये तहक़ीक़ का नतीजा बोहत बड़ी बात है. में इसकी नफ़ी नहीं कर रहा लेकिन मिसाल के तौर पर बड़ी जिद्दो-जहद के बावजूद आपकी तहक़ीक़

गलत हो गई तोह ये माखजय का जरिया नहीं बनेगी

असल चीज़ ये है के ग़लत नुक़्ता ए नज़र के मामले में भी आपका रवैया क्या रहा।

यानी ये गलती क्या तअस्सुब के वजह से हुई?

या ये गलती जज़्बात में मुब्तला होने के वजह से हुई?

या ये गलती किसी की अक़ीदत (blind-following) की वजह से हुई?

या ये ग़लती इंसान की फ़ितरी कमज़ोरियाँ जो हैं उसके लेहाज़ से हुई?

तो पहली चीज़ें जो हैं वो क़ाबिल-ए-मुआफी नहीं है लेकिन आखरी चीज़ काबिल ए मुआफी है.

इसका पूरी तरह एहसास भी होना चाइये और इस पर हर लहज़ा सोचते भी रहना चाइये.

मैं इसकी ज़रुरत इस ज़माने में बोहत ज़्यादा महसूस करने लगे हूँ क्यों की मैंने यह देखा है के ये चीज़ हमारी उम्मत में बोहत आम होती जा रही हैं.
एक चीज़ वो जिसकी तरफ मैंने इशारा किया वो नाता ’इज फ़िक्र निकलने में ही शब् -और -रोज़ मसरूफ रहती हैं और दूसरी यह के इस से

ख़ास तरह का एहसास-ए-बरतरी (Feeling of superiority) खुद को दूसरे से बेहतर समझना) इनकी गुफ्तगू मैं इनकी बात-चित मैं, लब्ब

और लहजा मैं आना शुरू होजाता है.यानी इनके लहजे में बात चीत में (इल्म का) घमंड झलकना शुरू हो जाता है.

इन दोनों से खुदा की पनाह मांगनी चाहिए. अल्लाह तआला को सब से जो चीज़ न’पसंद है वो आप जानते हैं के वो घमंड है और घमंड या

तकब्बुर के बारे मैं फ़रमाया गया है के ऊँट (कैमल) सुई (नीडल ) के नाके मैं दाखिल हो सकता है, लेकिन कोई मुतकब्बुर (घमंड करने वाला

शख्स) जन्नत मैं दाखिल नहीं हो सकता.

( क़ुरान, 7:40.)

अपने अंदर सच्ची आज़िज़ (Humbleness) पैदा करना चाहिए और हमेशा सच्चे इल्म का मुसाफिर बन कर रहना चाहिए

इस मैं ख़ास तौर पर अपना तज़किया करते हुए एक उसूली बात को पल्ले बाँध लें और वो यह है के किसी दर्जे में भी इबादत खुदा के सिवा

किसी की न हो और अदीक़ात (Blind-following) मुहम्मद ﷺ के सिवा किसी से न हो. बाकी जो कुछ भी है वो ज़्यादा से ज़्यादा क्या है?

जैसे आप अपने बड़े का, मुअल्लिम का एहतराम करते हैं.

अगर एहतराम, अदीक़ात (Blind-follwing) में बदलना शुरू होजाये तोह इसका मतलब ये है के नफ़्स आलूदा (Impure) होना शुरू होगया है. जहां से आप निकले थे अब वापिस वही जा रहे हैं, जिस सफर की अपने शुरुआत की थी आप फिर वापिस वही लौट रहे है.

ये एक बड़ा उतरन होगा, जिस से हर मुसलमान को, हर सच्चे इल्म के मुसाफिर को अल्लाह की पनाह मांगनी चाहिए.

असल चीज़ जिसका क़यामत के हवाले से हमें अपने अंदर पैदा करना है वो बे-तासुबि है. वो इल्म की सच्ची तालाब है

वो सहीह बात जानने के लिए ज़हनी तैयारी है. वो अक़ीदतो (Blind-following) से हैट कर चीज़ों (इल्म) को देखना है?

इसका एक लाज़मी तकाज़ा ये है के जहां कही भी इल्म पाया जाता है, आप उससे इख्तिलाफ करे लेकिन कभी किसी साहब-ए-इल्म के बारे मैं

बे-एह्त्रामि (Disrespect) का रवैय्या इख्तयार न करें. सब की दिल से रेस्पेक्ट करे. यही हमारे सहाबा का तरीका था की वो इख्तिलाफ तो

करते थे लेकिन एकदूसरे की इज़्ज़त करते थे. वो इख्तिलाफ में एक दूसरे को गुस्ताख़ ए रसूल या मंहजलेस, Etc नहीं कहते थे एकदूसरे को.

किसी शख्स के बारे मैं राये देती वक़त उसकी महासिन (भलाइयों) को कभी नज़र अंदाज़ मत करे.

अपने देखा होगा के मैं अपनी बाज़ जलील-उल-क़द्र बज़ुर्गो से, जिन के साया में मैंने शऊर की आँख खोली है, बड़ा शदीद इख्तिलाफ करता हूँ

लेकिन कभी उनकी अज़मत (Respect) के मामले में मेरे यहां कोई बुरा तास्सुर आपको नहीं मिलेगा.

मैं उनकी बड़ी इज़्ज़त करता हूँ और उनके महासिम (भलाइयों) पर लोगो को हमेशा तवज्जो दिलाता हु और बताता हु के वो कैसे बड़े लोग थे

और उनको अल्लाह तआला ने कैसा बेहतरीन अख़लाक़ अता किया था.

इल्म में गलती हो जाती है, उस गलती के बारे में हम गुफ्तगू करेंगे, इहलाह भी करेंगी. इस लिए किसी की अज़मत यहां तक न ले जाये के हम

उनकी गलती की ताईद (Defence) करने लग जाये और गलती पर तनक़ीद (Criticize) यहां तक न ले जाये के हम किसी शख्स का वाजिबी

एहतराम करना छोड़ दें.

ये चीज़ अगर पैदा हो जाये तो आप मैं और बाक़ी लोगों में कोई फ़र्क़ नहीं रह जायेगा

ये जितने इस वक़्त फ़िरक़े और गरोह बने हुए हैं ये असल में वो चीज़ है जिसका लेहाज़ न रखने से बने हैं.

अगर इन के जो रहनुमा हैं, उलेमा हैं वो हर मौक़ा पर इनको ये तवज्जो दिलाते के हम मुहम्मद रसूल अल्लाह ﷺ के पैरो (Follower) हैं

(नहीं, किसी बुज़ुर्ग या इमाम या मुहद्दिसीन के) कोई अगर गलती से पाक हस्ती है तो वो अल्लाह का रसूल ﷺ है, बाक़ी सारे के सारे उलेमा,

खावा वो बड़े बड़े आइमा हों वो इन्सान हैं.

इन से गलती हो सकती है और अपने बारे मैं भी ये कहते हैं हम अपनी तहक़ीक़ आपको बता रहे हैं और खुद भी हम इल्म के सफर मैं हर

लहज़ा मसरूफ हैं.

कोई हकीकत हम पर वाज़ेह हो जाएगी तो हम आपको बता देंगे, अगर कोई ग़लती समझ में आ जाएगी तो उसको सुधर लेंगे. आप पर अगर

किसी दूसरे शख्स की बात ज़्यादा वाज़ेह हो जाये और अगर आप महसूस करे के उस मैं हक़ है तो आपको उसी की पैरवी करनी चाहिए.

अल्लाह तआला ने किसी एक शख्स के साथ आपको नहीं बंधा है और ये बिलकुल एक हकीकत और एक वाक़्या है, जो हमारे बड़े बज़ुर्ग हैं,

जिन से तारिख रोशन है, उनकी ज़िंदगी और अमल से मालूम हो जाता है के उन में से किसी के बारे में ये नहीं कहा जा सकता है के वो 100%

दरुस्त है. यानी बा-हैसियत ए मजमूई (Altogether) हम अहले इल्म की क़दर भी करती हैं और अगर कोई अच्छी बात होती है तोह इसे

अपनाते भी हैं, और अगर कोई बात क़ुरान और सुन्नत के मुताबिक न समझ ए तो उनसे इख्तिलाफ भी करते है. तो यह

रवैय्या है इसके लिए हम जवाब-देह हैं अल्लाह के यहाँ. यानी हमारा यही रवैय्या होना चाहिए, ये सिरात-ए-मुस्तक़ीम (Sidha Rasta) है

ये सिरात-ए-मुस्तक़ीम है. इस पर हम को चलना है के हम तासुबात से बालातर हो कर ज़िन्दगी बसर करे, तो इल्म के मुआमले में मैं ये

समझता हूँ के इस की बार बार याददिहानी हमको करनी चाहिए. हम अपनी मजलिस में, अपनी स्टडी सर्किल में, जहां कही बैठें, लोगों को

हमेशा ये बताये के ये इल्म का सफर है, ये आखरी नताइज का बयान नहीं है.

इस में ये नहीं होनी चाहिए के हम पर नुबूवत ख़तम हो रही है, नुबूवत ख़त्म हो गई जिस पर होनी थी. हम सब के सब हुज़ूर ﷺ की बात को

समझने में मसरूफ हैं. और आइये आप भी साथ शामिल हो जाइये .

इस मैं जब आप दूसरों के साथ बात करते हैं, तो आपका दावत का उस्लूब (तरीका) यह नहीं होना चाहिए के अब ये हक़ हम पर नाज़िल हो

गया है और हम इसकी खबर देने के लिए आये हैं. नहीं ! यह होना चाहिए के जैसा एक सच्चा तालिब-इल्म करता है के भाई बात ये है के मैं भी

तुम्हारी तरह इल्म का मुसाफिर हूँ, मेरे इल्म मैं एक नयी बात आयी है, यह मुझे अपील करती है. तुम भी इस पर गौर कर लो.

आइये मिल कर इस पर गौर कर लेते हैं, मिल कर इसका मुताला कर लेते हैं, मिल कर इसको देख लेते हैं तोह ये जो ऐटिटूड और रवैय्यत है य

ह इल्म के तज़किये (Purification) की पहली मंज़िल है इसका हमेशा ख्याल रखना चाहिए।

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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