हक़ छुपाने की सजा, जानिए हदीस की रोशनी में

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HAQ CHUPANE KI SAZA – SALAF KE FAHM KE MUTABIK
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HAQ CHUPANE KI SAZA – SALAF KE FAHM KE MUTABIK

हक़ छुपाने की सजा सलफ के फ़हम के मुताबिक

अल्लाह पाक क़ुरान में फरमाते है,

बेशक जो लोग हमारी नाज़िल की हुई वाज़ेह आयात और हिदायत को छिपाते है, बा-वजूद ये के हम ने उसे अपनी किताब में लोगो के लिए

खूब बयान कर दिया है, तोह उन लोगो पर अल्लाह की लानत और तमाम लानत करने वालो की लानत है.

मगर वो लोग जो तौबा कर ले और इस्लाह कर ले और (उस छुपाये हुए इल्म को) बयान कर दे, तो मैं उन की तौबा क़ुबूल कर लेता हूँ और मैं

तौबा क़ुबूल करने वाला और रहम व करम करने वाला हूँ.

(सौराह बकरा, आयात: 159 और 160)

अबू हुरैरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा) रिवायत करते है की रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया,

“जिस शख्स से कोई इल्म की बात पूछी गई जो उस शख्स को मालूम थी

फिर भी उसने उस (Ilm) की बात को छुपा लिया तो ऐसे शख्स को क़यामत के दिन (अल्लाह की तरफ से सजा के तौर पे) आग की लगाम दाली जाएगी.”

(जामिआ तिरमिधि, हदीस: 2649; सुनन अबू दावूद, हदीस: 3658)

(Classed As Sahih By Sheikh Zubair Ali Zai And Sheikh Albani)

इमाम मुस्लिम (अपने शागिर्द का ज़िक्र करते हुए) फरमाते हैं।

“अल्लाह तआला तुमको हिदायत दे के तुमने उस बात का इरादह ज़ाहिर किया है के मैं इस क़िस्म की तमाम अहादीस का एक मजमुआ

तैयार कर के इख्तिसार के साथ तुम्हारे लिए जमा करदु. अल्लाह तआला तुम्हे इज़्ज़त अता फरमाए जब मैंने तुम्हारी इस फरमाइश पर गौर

किया और इस के अंजाम की तरफ तवज्जह की और अल्लाह करे इसका अंजाम अच्छा हो तो मुझे ये अंदाज़ा हुआ के और लोगो से पहले

खुद मुझे भी ये मजमुआ तैयार करने का फायदा होगा.

मज़बूती और सेहत के साथ थोड़ी सी अहादीस को याद रखना ज़्यादा आसान है खास तौर पे अवमुन-नास के लिए जिन्हे सहीह और गैर-

सहीह अहादीस में तमीज हासिल ही नहीं हो सकती जब तक के दूसरे लोग उनको बता न दे. पास ऐसी सूरत ए हाल में थोड़ी तादाद में सहीह

रिवायात जमा करने का इरादह करना बोहत ज़्यादा तादाद में ज़ईफ़ रिवायात जमा करने से ज़्यादा बेहतर और मुफीद होगा.”

मुक़द्देमाह सहीह मुस्लिम (Introduction) By इमाम मुस्लिम

अबू हुरैरह (रज़ि अल्लाहु अन्हा) रिवायत करते है और कहते है की, लोग कहते है के अबू हुरैरह बोहोत हदीसे बयान करते है.

(और मैं कहता हु के) क़ुरान में 2 आयते न होती तो मैं एक भी हदीस बयान न करता. [फिर ये आयत पढ़ी, (Tarjuma) “जो लोग अल्लाह की

नाज़िल की हुई दलीलों और आयतो को छुपाते है (आखिर आयत, رحيم) तक.

” (सौराह बकरा, आयात- 159 और 160)

(वाक़्या ये है के) हमारे मुहाजिरीन भाई तो बाजार की खरीद और फरोख्त में लगे रहते थे और अंसार भाई अपनी जायदादों में मशगूल रहते थे

लेकिन मैं (अबू हुरैरा) रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथ जी भर कर रहता ताके आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की रफ़ाक़त में

शिकमपुरी से भी बेफिक्री रहे) और उन मजलिसो में हाज़िर रहता जिनमे दूसरे हाज़िर न होते और वो बाते महफूज़ रखता जो दूसरे महफूज़

नहीं रख सकते थे।

(सहीह अल बुखारी, हदीस-118)

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