क्या जमात से नमाज़ पढ़ने वाले को इमाम के साथ दुआ मांगना भी ज़रूरी है

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SHAB-E-QADAR KE DUA
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KYA JAMAT SE NAMAZ PADNE WALE KO IMAAM KE SATH DUA MANGNA BHI ZARURI HAI

क्या जमात से नमाज़ पढ़ने वाले को इमाम के साथ दुआ मांगना भी ज़रूरी है

हर नमाज़ सलाम फेरने पर मुकम्मल हो जाती है

उसके बाद जो दुआ मांगी जाती है यह नमाज़ में दाखिल नहीं अगर कोई शख्स नमाज़ पढ़ने यानी सलाम फेरने के बाद बिल्कुल दुआ न

मांगने तब भी उसकी नमाज़ में कमी नहीं अलबत्ता एक फ़ज़ीलत से महरूमी और सुन्नत की खिलाफ वर्ज़ी है.

कुछ जगह देखा गया की इमाम लोग बहुत लम्बी लम्बी दुआएं पड़ते हैं।

और मुक्तदी कुछ ख़ुशी के साथ और कुछ बेरगबती से मजबूरन उनका साथ निभाते हैं।

और कोई बगैर दुआ मांगे या थोड़ी दुआ मांग कर इमाम साहब का पूरा साथ दिए बगैर चला जाये

तो उस पर एतराज़ करते हैं और बुरा जानते हैं

यह सब उनकी गलत फेहमिया हैं इमाम के साथ दुआ मांगना मुक्तदी के ऊपर हरगिज़ लाज़िम व ज़रूरी नहीं यह नमाज़ पूरी होने के बाद

फ़ौरन मुक्तसर दुआ मांग कर भी जा सकता है

और कभी किसी मज़बूरी की वजह से बगैर दुआ मांगे चला जाये तब भी नमाज़ में कमी नहीं आती हवाले के लिए

(फतवा रजविया जिल्द सौम्य पेज 278 देखें)

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मसले का खुलासा:

इमाम के साथ दुआ मांगना कोई ज़रूरी

या लाज़मी नहीं है मगर इसका मतलब ये भी नहीं है की आप आज से

ही इमाम के साथ दुआ

मांगना छोड़ दे

इमाम के साथ बहुत सारे लोग दुआ मांगते है

जो की एक इज्तेमाई दुआ होती है

या बहुत सारी जमात मिलकर एक साथ

दुआ मांगे तो दुआ जल्द क़ुबूल होती है

हदीस में इज्तेमाई दुआ की फ़ज़ीलत

आयी है

जैसा की जब बारिश नहीं होती उस

उस वक़्त बहुत सारे लोग बारिश के लिए

दुआ करते है तो अल्लाह के फज़ल से

बारिश होने लगती है

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नमाज़ की शर्तों का बयान

क्या पता जमाअत में कोई अल्लाह में एक ऐसा बन्दा हो जिसकी दुआ की वजह से हमारी भी दुआ क़ुबूल हो जाएजब इमाम दुआ करता है

तो लोग उसकी दुआ पर आमीन कहते हैं

आमीन कहने का मतलब यही होता है

की या अल्लाह दुआ क़ुबूल फार्मा

या अल्लाह में भी इस दुआ में शामिल हूँ

कोई ज़रूरी काम हो तभी दुआ मुख़्तसर

मांग कर चले जाये वरना इमाम के साथ दुआ

मुकम्मल करें क्यूंकि इज्तेमाई दुआएं

ज़्यादा क़ुबूल होती है

अल्लाह अमल की तौफ़ीक़ दे

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