यौम उल हज और वुक़ूफ़ ए अरफ़ा

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Juma ki raat ke kuch khaas amal jo huzoor ﷺ ke farman se
Arafat Ka Maidan
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Yaum ul Hajj aur Wuqoof e Arafa

यौम उल हज और वुक़ूफ़ ए अरफ़ा

हदीस ए नबवी :

(1) हुज़ूर रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया

अरफ़ात के दिन अल्लाह तआला आसमानी दुनिया पर
नुज़ूल ए इजलाल फरमाता है
और फ़रिश्तो के सामने मैदान ए अराफात में जमा होने वालो
पर फख्र फरमाता है और फरमाता है

“ए फ़रिश्तो! तुम मेरे बन्दों को देख रहे हो
वो मेरी बारगाह में परगंदह बाल,
गर्द आलूद चेहरों में दूर दराज़ तंग
और कुशादा रास्तो से चल कर यहाँ हाज़िर है
और तस्बीह और तहलील ज़िक्र ओ तल्बियह करते
हुए मुझे पुकार रहे हैं।

ए फ़रिश्तो! तुम गवाह रहो मैंने इन सब को बख्श दिया।’

यह सुनकर फ़रिश्ते अर्ज़ करते हैं

‘इलाही! इन में फलाँ मर्द और फलाँ औरत भी है जो गुनाहगार है।’

अल्लाह तआला फरमाता है

‘सुनो। मैंने नेको के साथ इन को भी बख्श दिया।’

यह फरमाकर हुज़ूर आक़ा ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया
“किसी और दिन दोज़ख से उतने बन्दों को रिहाई नहीं मिलती
जितने बन्दों को अराफात के दिन दोज़ख से रिहाई मिलती है।”

(मिश्कात-उल-मासबीह)

(2) हुज़ूर रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया

“ऐसा कोई दिन नहीं
जिस में अल्लाह तआला अराफ़ा के दिन से ज़्यादा बन्दों को
आग से आज़ाद करता हो
और अल्लाह तआला बन्दों के क़रीब होता है,
फिर फ़रिश्तो के सामने हज करने वालो पर फख्र फरमाता है।’

(मुस्लिम)

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मक्काः मुकर्रमा में 9 ज़िल हिज्जः का मुकबरक दिन

इस दिन ख़ुशक़िस्मत हाजी साहिबान हज के अरकान अदा करने के लिए
मीना से अराफात आये
और इस मुक़द्दस मक़ाम जमा होकर पूरा दिन
अल्लाह तआला की इबादत और दुआ करेंगे।

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हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) और हज़रते हव्वा (रज़िअल्लाहु तआला अन्हा)
मैदान ए अराफात में जबले रहमत के मुक़द्दस
और मुबारक मक़ाम फिर से एक दूसरे से मिले थे और
हुज़ूर मोहम्मद मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सड़के में
अल्लाह तआला ने अपनी रहमत
और फ़ज़ल से उन की दुआ क़ुबूल फ़रमाई।

हज्जतुल विदा के मौके पर हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने
असर की नमाज़ के बाद अराफात में
जबले रहमत के मुक़द्दस मक़ाम के क़रीब खड़े होकर
दुआएं मांगी थी और यही पर आखरी वही नाज़िल हुई थी।

इस मैदान में हज़रते इल्यास अलैहिस सलाम और हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम
यहाँ पर तशरीफ़ फार्मा होते हैं।

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वुक़ूफ़ ए अराफ़ा हज का पहला फ़र्ज़ अरकान है

और इस का वक़्त ज़वाल के बाद से लेकर ग़ुरूब ए आफताब तक है।

इस दौरान अगर कोई एहराम के साथ निय्यत करके
और लब्बैक पढ़कर मैदान ए अराफात में
कुछ लम्हो के लिए भी हाज़िर हो गया उस का ‘हज’ हो जाएगा।

और जो किसी भी वजह से इस वक़्त के दौरान
यहाँ हाज़िर न हो सका उस का हज न होगा।

ग़ुरूब ए आफताब के बाद तमाम हाजियो को
बग़ैर नमाज़ ए मग़रिब पढ़े यहाँ से मुज़दलीफह की तरफ रवाना होंगे।
मुज़दलीफह में उन को मग़रिब और ईशा मिलाकर साथ में अदा करेंगे।

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अल्लाह तआला उस के हबीब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सदक़े में
तमाम हाजियो के हज को क़ुबूल फरमाए और उन की दुआओ को क़ुबूल फरमाए।
सब मोमिनो को ये सआदत अता फरमाए।

आमीन।

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आमीन

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