इस्लाम से पहले औरत का मक़ाम और हैसियत

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Islam se Pehle Aurat Ka Maqam aur Hasiat
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Islam se Pehle Aurat Ka Maqam aur Hasiat

इस्लाम से पहले औरत का मक़ाम और हैसियत

औरत इस्लाम से पहले

इस्लाम दुनिया का सबसे पुराना मज़हब है क्यूंकि पहले इन्सान मुसलमान थे सारे दुनिया के आप आदम अलैहिस्सलाम है जो की मुसलमान थे

यहाँ उस दौर का ज़िकर किया जा रहा है जब नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तसरीफ नहीं लाये थे

यानी दौरे जाहिलियत का ज़िक्र किया जाएगा

इस्लाम से पहले औरतों का हाल बहुत ख़राब था

दुनिया में औरतों की कोई इज़्ज़त व वक़त ही नहीं थी

मर्दों की नज़र में इस से ज़्यादा औरतों की कोई हैसियत ही नहीं थी

की वह मर्दों की नफ़्सानी ख्वाहिश पूरी करने का एक खिलौना थी

औरत दिन रात मर्दों की क़िस्म-क़िस्म की खिदमत करती थीं

और तरह-तरह के कामों से यहाँ तक की दूसरों की मेहनत मज़दूरी कर के जो कुछ (Kamati) थी वो भी मर्दों को दे दिया करती थीं

मगर ज़ालिम मर्द फिर भी इन औरतों की कोई क़द्र नहीं करते थे

बल्कि जानवरों की तरह इन को मारते पिटते थे

ज़रा-ज़रा सी बात पर औरतों के कान नाक वग़ैरह वज़ह काट लिया करते थे

और कभी क़त्ल भी कर डालते थे

औरत इस्लाम से पहले

अरब के लोग लड़कियों को ज़िंदह दफ़न कर दिया करते थे

और बाप के मरने के बाद उसके लड़की जिस तरह बाप के सामान जायदाद के मालिक हो जाया करते थे

इसी तरह अपने बाप की बीवियों के मालिक बन जाया करते थे

और इन औरतों को ज़बरदस्ती लौंडियाँ बना कर रख लिया करते थे

औरतों को इन के मान बाप भाई बहन या शौहर की मीरास में कोई हिस्सा नहीं मिलता था

न औरतें किसी चीज़े की मालिक हुआ करती थीं

अरब के बाज़ क़बीलों में ये ज़ालिमाना दस्तूर था की बेवा हो जाने के बाद और रतों को घर से बहार निकाल कर एक छोटे से तंग व तरीक़

झोपड़ी में एक साल तक क़ैद रखा जाता था

वह झोपड़ी से बाहर नहीं निकल सकती थीं

न ग़ुस्ल करती थीं न कपड़े बदल सकती थीं

खाना पानी अपनी सारी ज़रूरतें इसी झोपडी में पूरा करती थीं

बहुत सी औरतें तो घुट घुट कर मर जाया करती थीं

और जो ज़िंदह बच जातीं एक साल बाद इनके आँचल में ऊंठ की मेंगनियाँ डाल दी जाती थीं

और इनको मजबूर किया जाता था की वह किसी जानवर के बदन से अपने बदन को रगड़ें

फिर सारे शहर का इसी लिबास में चक्कर लगाएं

और उधर ऊंठ की मेंगनियाँ फेंकती हुई चलती रहें

यह इस बात का एलान होता था की इन औरतों की इद्दत ख़त्म हो गई

इसी तरह दूसरी भी तरह-तरह की ख़राब और तकलीफ देह रस्में थीं

जो ग़रीब औरतों के लिए मुसीबतों और बालाओं की पहाड़ बानी हुई थीं

और बेचारी मुसीबत की मरी औरतें घुट-घुट कर और

रो-रो कर अपनी ज़िन्दगी के दिन गुज़रती थीं

औरत इस्लाम से पहले

हिंदुस्तान में तो बेवा औरतों के साथ ऐसे-ऐसे दर्दनाक ज़ालिमाना सुलूक किये जाते थे

की जिन को सोच कर कलेजा मुंह को आ जाता है

हिन्दू धर्म में हर औरत के लिए फ़र्ज़ था की वह

ज़िन्दगी भर क़िस्म-क़िस्म की खिदमतें कर के पति पूजा (शौहर की पूजा) करती रहे

और शौहर के मरने के बाद उसकी चिता की आग के शोलों

पर ज़िंदह लेत कर सती हो जाये

यानी शौहर की लाश के साथ ज़िंदह औरत भी जल कर राख हो जाये

ग़र्ज़ पूरी दुनिया में ज़ालिम बेरहम मर्द औरतों पर

ऐसे -ऐसे ज़ुल्मो सितम के पहाड़ तोड़ते थे

की इन ज़ालिमों की दास्तान सुन कर एक दर्दमंद इंसान

के सीने में रंजो ग़म से दिल टुकड़े-टुकड़े हो जाता है

इन मज़लूम और बेकस औरतों की मजबूरी व लाचारी का यह आलम था

की समाज में न औरतों के कोई हुक़ूक़ थे न इनकी मज़लूमियत पर दाड़ो फरियाद के लिए किसी क़ानून का कोई सहारा था

हज़ारों बरस तक ये ज़ुल्मों सितम की मरी ये दुखयारी

औरतें अपनी इस बे कासी और लाचारी पर रोती बिलबिलाती और आंसूं बहती रहीं

मगर दुनिया में कोई भी इन औरतों के ज़ख्मों पर मरहम रखने

वाला और इनकी मज़लूमियत के आंसुओं को पोंछने वाला

दूर-दूर तक नज़र नहीं आता था

न दुनिया में कोई भी इनके दुःख दर्द की फरियाद सुनने वाला था

न किसी के दिल में इन औरतों के लिए बाल बराबर भी रहमो करम का जज़्बा था

औरतों के इस हाल ज़ार पर इंसानियत रंजो ग़म से बेचैन और बे क़रार थी

मगर इसके लिए इसके सिवा कोई चारह कार नहीं था की वह रहते खुदावन्दी का इंतेज़ार करे

की अर्हमार-रहीमीन ग़ैब से कोई ऐसा सामान पैदा फार्मा दे

की अचानक सारी दुनिया में एक अनोखा इंक़ेलाब नमूदार हो जाये

और लाचार औरतों का सारा दुःख -दर्द दूर हो कर इन का बेडा पर हो जाये

चुनांचे रहमत का आफताब जब तुलु-आ हो गया

तो सारी दुनिया ने अचानक महसूस किया की

“जहाँ तारीक़ था ज़ुल्मत कड़ा था सख्त काला था

कोई पर्दे से क्या निकला की घर-घर में उजाला था”

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