रोज़ा खोलने की दुआ, जानिए हदीस पढ़ कर शेयर जरुर करें

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Roza
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ROZA KHOLNE KI DUA

रोज़ा खोलने की दुआ

मरवान इब्न सलीम अल-मुकफ्फा’ (R.a.) कहते है मैंने अब्दुल्लाह बिन उम्र (R.a.) को देखा,

वो अपनी दाढ़ी को मुट्ठी में पकड़ते और जो मुट्ठी से ज़्यादा होती उसे काट देते.

इब्न उम्र (R.a.) कहते है की रसूलल्लाह ﷺ जब इफ्तार करते तो ये दुआ पढ़ते थे,

ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ الْعُرُوقُ وَثَبَتَ الأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ

“ढहबा अल-जमा’ व अबतलत अल-‘उरुक व तबाता अल-अज्र इनशअल्लाह”

“प्यास ख़त्म हो गई, राजन तर हो गई और सवाब पक्का हो गया अगर अल्लाह ने चाहा,

नोट: ये दुआ रोज़ा खोलने के बाद पढ़नी है न की पहले.

एक दूसरी भी दुआ हमारे मुआशरे में मशहूर है,

“अल्लाहुम्मा लका संतु व ‘अला रिज़्क़ीक़ा अफ्तरतो”

सुनें अबू दावूद, हदीस- 2358.

लेकिन ये दुआ उसूल ए मुहद्दिसीन के नज़दीक मुरसल है जिस वजह से ये हदीस ज़ईफ़ हो जाती है.

ये हदीस इसलिए मुसरल है क्युकी इसमें मुआध इब्न ज़ुहराह (r.h.) जो की एक ताबईन है वो डायरेक्ट नबी से इस हदीस को बयान कर रहे है

बिना ये बताये की उन्होंने किस सहाबा से हुज़ूर की इस हदीस को सुनी. इस तरह की हदीस को उलेमा ए मुहद्दिसीन ने मुरसल कहा है

और इस पर ज़ईफ़ का हुक्म लगाया है. इसलिए ये हदीस क़ाबिल ए अमल नहीं हो सकती दीन की रौशनी में.

शैतान के तरफ से ये भी वास्-वसा आ सकता है की हदीस के अल्फ़ाज़ में तो कुछ गलत नहीं है फिर इसमें क्या प्रॉब्लम है तो इसके लिए एक लॉजिकल आंसर है:

सहीह अल बुखारी, किताबुल वुज़ू, हदीस न० 247 है, ये एक थोड़ी लम्बी हदीस है. इस हदीस की अरबिक पेश ए खिदमत है,

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مُقَاتِلٍ، قَالَ أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ، قَالَ أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ سَعْدِ بْنِ عُبَيْدَةَ، عَنِ الْبَرَاءِ بْنِ عَازِبٍ، قَالَ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏”‏ إِذَا أَتَيْتَ مَضْجَعَكَ فَتَوَضَّأْ وُضُوءَكَ لِلصَّلاَةِ، ثُمَّ اضْطَجِعْ عَلَى شِقِّكَ الأَيْمَنِ، ثُمَّ قُلِ اللَّهُمَّ أَسْلَمْتُ وَجْهِي إِلَيْكَ، وَفَوَّضْتُ أَمْرِي

إِلَيْكَ، وَأَلْجَأْتُ ظَهْرِي إِلَيْكَ، رَغْبَةً وَرَهْبَةً إِلَيْكَ، لاَ مَلْجَأَ وَلاَ مَنْجَا مِنْكَ إِلاَّ إِلَيْكَ، اللَّهُمَّ آمَنْتُ بِكِتَابِكَ الَّذِي أَنْزَلْتَ، وَبِنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ‏.‏ فَإِنْ مُتَّ مِنْ لَيْلَتِكَ فَأَنْتَ عَلَى الْفِطْرَةِ، وَاجْعَلْهُنَّ آخِرَ مَا تَتَكَلَّمُ بِهِ ‏”‏‏.‏ قَالَ فَرَدَّدْتُهَا عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَلَمَّا بَلَغْتُ ‏”‏ اللَّهُمَّ آمَنْتُ بِكِتَابِكَ الَّذِي

أَنْزَلْتَ ‏”‏‏.‏ قُلْتُ وَرَسُولِكَ‏.‏ قَالَ ‏”‏ لاَ، وَنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ ‏”‏‏

इस हदीस में एक सहाबी को रसूलल्लाह ने एक सोने के वक़्त की एक दुआ तालीम फ़रमाई जिसमे अल्फ़ाज़ थे “बिना-बियिका-ल लड़ी असाल्ट” जिसका मतलब होता है

की “मै इमान लाया उस किताब पर जो तूने अपने नबी के साथ नाज़िल की”. लेकिन उस सहाबी ने दुआ में पढ़ दिया “व-रसूलिका” इसका मतलब होता है

“मै इमान लाया उस किताब पर जो तूने अपने रसूल के साथ नाज़िल की”.गौर करे,

उस सहाबी ने बस इतना किया था की नबी के अल्फ़ाज़ को उसने रसूल के साथ बदल दिया था, जब की रसूल का अल्फ़ाज़ नबी के अल्फ़ाज़ सेबड़े दर्जे पे फ़ैज़ है,

लेकिन रसूलल्लाह ने फ़ौरन उस सहाबी को कहा “नहीं, लेकिन वही कहो जो मैंने तालीम फ़रमाई है.”

यानी नबी को नबी ही कहो रसूल मत कहो इस दुआ में. तो आप ज़रा बताये जब इस तरह की अल्फ़ाज़ बदलने से रसूलल्लाह ने मन फ़रमाया तो फिर उस अल्फ़ाज़ का क्या मुक़ाम होगा जो रसूलल्लाह ने कहा ही नहीं, लेकिन नसीहत से

तो अक़्ल-वाले ही फायदा उठाते है. अल्लाह पाक क़ुरान में फरमाते है,

“वो (जहन्नमी) कहेंगे, काश हम उनकी बात सुन लेते और अपने अक़्ल का इस्तेमाल करते तो हम दोज़खयों मैसे न होते.”

सौराह मुल्क (67), आयात-10.

अल्लाह से दुआ है की वो हमें दीन को समझने की और उस पर अमल करने की तौफीक दे. आमीन

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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3 COMMENTS

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