क्या क़ुरान सिर्फ अरबिक में तिलावत करने के लिए नाज़िल हुआ है?

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jannat main kon dakhil nahi ho ga
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kya Quran sirf Arabic me tilawat karne ke liye nazil hua hai?

क्या क़ुरान सिर्फ अरबिक में तिलावत करने के लिए नाज़िल हुआ है?

आज इल्म की कमी की वजह से हम नुज़ूल-ए-क़ुरआन के असल मकसद से महरूम रह गए,

और सिर्फ सवाब के लालच में क़ुरआन का इस्तेमाल करने लग गए,

जैसे मिस्साल के टूर पर हमारी मुस्लमान बहने सवाब के लिए क़ुरान अरबी में पढ़ती रहती है,

और पढ़ते हुए सौराह निसा की आयत 3 आती है “जहा अल्लाह तआला फरमाता है

इसी के ए मुसलमान मर्द आदमी तुम 2,3,4 बीवियों से निकाह कर सकते हो.”

अब इन्होने पढ़ा अरबी में और अल्लाह से दुआ कीके “ए अल्लाह हर हर्फ़ के बदले 10-10 नेकी होना,”

लेकिन जब इनका शोहर कभी दूसरा निकाह करने गया तो “कैसा करता देखती मै,” माशाअल्लाह

अरे लेकिन क़ुरआन में हुक्म है न!

होंगे क़ुरान में लेकिन मुझे क्या?”

सुब्हानअल्लाह! अंदाज़ा भी है क्या सुलूक करते है हम अल्लाह की नाज़िल करदा हिदायत का ज़िन्दगी भर हम इसे महज सवाब के लालच में ही पढ़ते है

लेकिन कभी इसके माने महफूम पर गौरव फ़िक्र नहीं करते, जबकि सवाब तो बोनस है वो तो मिल जायेगा इन्शाअल्लाह!

अलहम्दुलिल्ला! क़ुरान की तिलावत की फैज़लात अपनी जगह है,

लेकिन क़ुरान का असल मकसद इसाइयत की हिदायत है

जिसके ताल्लुक से अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान-ए-करीम में फरमाता है के–ए नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! ये मुबारक किताब (क़ुरआन) है

जिसे हमने आपकी तरफ इस लिए नाज़िल किया के लोग इसकी आयतो पर गौर करे और अक़लमंद इस से नसीहत हासिल करे.

– (अल-क़ुरान सौराह (38) साद: आयात-29)

तो क़ुरान के नुज़ूल का असल मकसद हिदायत है, लेकिन फिर भी हम इसे महज़ सवाब के लिए पढ़ते है,

यही वजह है के हम अल्लाह की हिदायत से महरूम रह गए, और जहालत हम पर तारी हुई, जिसका फायदा उम्मत के बाज़ शरर पसंद लोगो ने खूब उठाया,

“हमे मस्लकी और फ़िरक़ावरीयत में उलझाया, क़ुरआन से हिदातर हासिल करने के बजाये

इसे मुर्दो पर बखस्वय, बेशुमार बिद्दते ईजाद कर इन्होने अपनी बातिल दुकाने खूब चलायी लेकिन कभी हमे क़ुरान के असल मकसद से तरफ नहीं करवाया, सिवाय उलेमाए हक़ के,लिहाजा मेरे अज़ीज़ो!

आज अगर हमे ज़िल्लत और रूज़्वाई से बहार निकलना है तो हमे चाहिए के हम क़ुरआने करीम की हिदायत को समझे, इसके माने महफूम पर गौर करे,

और जितना हो सके इसपर खुद भी अमल करे और दुसरो को भी इसकी दावत दे.

इन्शाअल्लाह उल अज़ीज़!

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से आखिर में दुआ है के

अल्लाह हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे..

हम तमाम के लिए क़ुरआने मजीद को पढ़ना , समझना और उसपर अमल करना आसान फरमाए ,..

जब तक हमे ज़िंदा रखे इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखे

खत्म हमारा ईमान पर हो…

व आखीरु दवना अनिलहम्दुलिल्लाहे रब्बिल आलमीन!

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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