छोटे का बड़े को सलाम करते वक़्त झुकना

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Chote ka Bade ko Salam karte waqt Jhukna

छोटे का बड़े को सलाम करते वक़्त झुकना

मुझे एहतराम में शिर्क का मामला बहुत हैरान करता है, हमारे यहाँ रिश्तेदारों की आदत है के छोटा बड़े को सलाम करते वक़्त थोड़ा झुक कर सलाम करता है,

और बड़ा प्यार से उस के सर पर हाथ रखता है. लेकिन सलाम के वक़्त कोई शख्स इतना नहीं झुकता जितना एक मुसलमान रुकू में झुकता है, क्या ऐसा करना जाइज़ है, या नहीं?

जवाब:

किसी को मिलते वक़्त झुकना, रुकू जितना या काम, जाएज़ नहीं है. चाहे आलिम ए दीन ही हो या कोi और शख्स. शैख़ उल इस्लाम इब्न तैमिया (r.h.) कहते है:

“सलाम करते वक़्त झुकना मना है जैसा के तिर्मिज़ी की हदीस में बयान हुआ है,

सहाबा कराम ने नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से दरयाफ्त किये के अगर कोई आदमी अपने भाई से मिले तो क्या वो उस के लिए झुके?

रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाए, “नहीं”.

(जमीअत-तिर्मिज़ी, Chapters on Seeking Permission, Vol. 5, Book 40, Hadith-2728.)

(मजमू‘ अल-फतावा, 1/377.)

और उन्होंने फ़रमाया,

“और रहा मसला के बड़े शख्स और मक़ाम और मर्तबा रखने वालो के सामने सर झुकना, या ज़मीन बोसी करना वग़ैरा की मुमानिअत में कोई इख़्तेलाफ़ नहीं है

बल्कि ग़ैर अल्लाह के लिए तो पीठ झुकना भी मना है. मुसनद ए अहमद वग़ैरह में माज़ बिन जबल (r.a.) से हदीस मरवी है

के, माज़ बिन जबल (r.a.) जब शाम से वापस आये तो उन्होंने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)को सजदा किये तब रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने  \दरयाफ्त किये, “माज़ ये क्या है?”

तो माज़ (r.a.) ने जवाब दिए, “ए अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मै ने शाम में देखा के वह के लोग अपने पादरियों (Priest) और रहिबो को सज्दा करते है और कहते है उनके अम्बिया से ऐसा ही साबित है.”

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया,

“ए माज़, अगर मै अल्लाह के सिवा किसी को सजदे का हुक्म देता तो औरतो से कहता के वो अपने शौहर को सज्दा करे क्यों की खावंद का अपनी बीवी पर अज़ीम हक़ है.

ए माज़, ज़रा ये बताओ के क्या अगर तुम मेरी क़ब्र के पास से गुजरोगे तो सज्दा करोगे?”माज़ (r.a.) ने फ़रमाया, “बिलकुल नहीं”.

नबी (saws ) ने फरमाए:” (है) तुम ऐसा मत करो.” या जैसे के हदीस में रसूल(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है.”

खुलासा ये हुआ के : क़ायम और कौऊद और रुकूउ और सुजूद सिर्फ ख़ालिक़ ए समात और अर्द, वह्दहू ला शरीक का हक़ है और अल्लाह सुबहाना और तआला का खालिस हक़ हो इस में किसी दूसरे का हक़ नहीं होता.

(मजमुआ अल फतवा 27/92,93.)

और मुस्तक़िल फतवा कमिटी के उलमा का कहना है:

“किसी मुस्लमान या काफिर को सलाम करते वक़्त झुकना जायज़ नहीं, न तो जिस्म के ऊपर के हिस्से को और न सर को झुकना जाएज़ है

क्यों की झुकना इबादत का जुज़ है और इबादत हर तरह की सिर्फ अल्लाह ही के लिए है.”

शेख ‘अब्द अल-‘अज़ीज़ इब्न बाज़, शेख ‘अब्द अल-रज़्ज़ाक़ ‘अफीफी, शेख ‘अब्द-अल्लाह इब्न घडयाँ, शेख ‘अब्द-अल्लाह इब्न क़ऊद.

फतावा अल-लजनह अल-डायमः, 1/233, 234.

और अल्लाह सब से बेहतर जनता है.

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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