दिखावे की क़ुरबानी अल्लाह के यहाँ मक़बूल नहीं…

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Dikhawe Ki Qurbani Allah Ke Yaha Maqbul Nahi…
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Dikhawe Ki Qurbani Allah Ke Yaha Maqbul Nahi…

दिखावे की क़ुरबानी अल्लाह के यहाँ मक़बूल नहीं…

अल-क़ुरआन: बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम !

“बेशक अल्लाह तआला को न तो तुम्हारे क़ुरबानी का गोश्त पोहोचता है

और ना ही खून! मगर है उस तक तुम्हारी परहेज़गारी पोहोचती है”

(सौराह (22) हज: आयात-37)

सबक़!

आज हमारे क़ुर्बानियों का क्या आलम है बहरहाल बताने की जरुरत भी नहीं, लोग क़ुरबानी का जानवर भी लाते है तो उसके साथ फोटोज खिचवाते है,..

अब जानवर की इज़्ज़त उनसे हो रही है या उनकी इज़्ज़त जानवर से? वो हमे नहीं पता ,…

अल्लाह रेहम करे! ये रिया कारी के अमाल आज बहुत आम हो रहे हमारे इलाक़ो और मोहल्लो में,..

और कम्पटीशन किया जाता है के–

“फलाह का जानवर इतना महंगा ,..

तो हम भी उस से महंगा लाएंगे ! ”(सुब्हान’अल्लाह)

ताज्जुब की बात है! हमे बुनियादी इल्म तक नहीं के क़ुरबानी का असल मक़सद होता क्या है,

जबकि अल्लाह राबुल इज़्ज़त खुद इस आयत में बयान फरमाता है के–

“उस तक ना तो तुम्हारी क़ुरबानी का खून पोहोचता है और ना ही गोश्त ,..

मगर तक़वा और परहेज़गारी पोहोचती है,”

तो बहरहाल हमे चाहिए के इस अज़ीम क़ुरबानी के जस्बे को समझे

इसके अहकाम और मसाइल का सही इल्म हासिल करे,

ताकि हमारी क़ुरबानी अल्लाह के नज़दीक क़ाबिल-ए-कबूल हो,

इंशा अल्लाह-उल-अज़ीज़!

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे,..

जब तक हमे ज़िंदा रखे इस्लाम और ईमान पर ज़िन्दा रखे…

खत्म हमारा ईमान पर हो!

व आखीरु दवना अनिलहम्दुलिल्लाहे रब्बिल आलमीन!

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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