निफ़ास का हुक्म जानिए

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Nifaas Ka Hukm
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Nifaas Ka Hukm

निफ़ास का हुक्म

बच्चे की पैदाइश के बाद जो खून आता है, इसे निफ़ास कहते हैं.

उम्मे सलमा (r.a.) फरमाती हैं के निफ़ास वाली औरतें रसूल अल्लाह के ज़माने में 40 दिन बैठा करती थीं (नमाज़ वग़ैरा नहीं पढ़ती थीं).

(अबू दावूद: अत तहारा 311–तिर्मिज़ी: अत तहारा 139 – इब्ने मज्जा 648) इसे इमाम हाकिम (V1 P175) और हाफ़िज़ ज़हबी ने सहीह,

जबकि इमाम नववि ने हसन कहा. अक्सर सहाबा और ताबईन के नज़दीक निफ़ास के खून की ज़ियादा से ज़ियादा मुद्दत 40 दिन हैं.

अगर 40 रोज़ के बाद भी खून जारी रहे तो अक्सर अहले इल्म के नज़दीक वो खून इस्तेहाज़ा है,

जिस में औरत हर नमाज़ के लिए वज़ू करती है. निफ़ास की काम आज काम मुद्दत की कोई हद नहीं.

सय्यदना अनस (r.a.) फरमाते हैं: ‘निफ़ास की मुद्दत 40 दिन है इल्ला ये के खून पहले ही बंद हो जाए’ (बहीखी)

इमाम शाफ़ई फरमाते हैं: ‘अगर औरत को विलायत के बाद खून आता ही नहीं तो इस पर ज़रूरी है के वॉ ग़ुस्ल करे और नमाज़ पढ़े.’

निफ़ास और हैज़ के खून का हुकम एक जैसा है यानी इन हालात में नमाज़ रोज़ा और जमा मन है.

रसूल अल्लाह (s.a.w.) अय्याम ए निफ़ास की नमाज़ें की क़ज़ा का हुकम नहीं देते थे.

(अबू दावूद: अल तहारा, बाब मज्जा, फी वक़्त अन नफसा 312) इसे इमाम हाकिम और इमाम ज़हबी ने सहीह कहा.

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