शिर्क किसे कहते है?

0
454
Kufr O Shirk Kisse Kehte Hain
Allah Taala
Islamic Palace App

Kufr O Shirk Kisse Kehte Hain

शिर्क और कुफ्र

सवाल: शिर्क किसे कहते है ?

जवाब: खुदाई तआला की ज़ात व सिफ़ात में किसी को शरीक तेहरान शिर्क है.

ज़ात में शरीक ठहरने का मतलब यह है के दो (2) या दो (2) से ज़्यादा खुदा माने जैसे ईसाई तीन (3) खुदा मान कर मुशरिक हुवे.

और सिफ़ात में शरीक ठहरने का मतलब यह है की खुदाई तआला की सिफ़ात की तरह किसी दूसरे के लिए

कोई सिफ़ात साबित करे मसलन सुन्ना और देखना वगैरा जैसा की खुदाई तआला पैर साबित है,

उसी तरह किसी दूसरे के लिए सुन्ना और देखना वगैरा जाती टूर पर  माने की बगैर खुदा के दिए उससे ये सिफातें खुद हासिल है,

तो शिर्क है और अगर किसी दूसरे के लिए जताई तौर पर माने के खुदाई तआला ने उससे ये सिफातें आता की है

तो शिर्क नहीं जैसा की अल्लाह तआला ने खुद इन्साफ के बारे में पारा 29 रुकू 19 में फ़रमाया जिसका तर्जुमा ये है की हमने इंसान को सुनने वाला देखने वाला बनाया.

सवाल: कुफ्र किसे कहते है?

जवाब: ज़रूरियाते दीन में से किसी एक बात का इनकार करना कुफ्र है.

ज़रूरियाते दीन बहुत है उनमे से कुछ ये है

खुदाई तआला को एक और वाजिबुल वजूद मानना

उसकी ज़ात व सिफ़ात में किसी को शरीक ना समझना,

जुल्म और झूट वगैरा तमाम उयूब से उसको पाक मानना,

उसके मलाइका और उसकी तमाम किताबो को मन्ना

क़ुरआन मजीद की हर आयत को हक़ समझना

हुज़ूर सैयदे आलम सल्ललाहु अलैहि वसल्लम और तमाम अम्बिया -ए-किराम की नुबूवत को तस्लीम करना उन सबको अज़मत वाला जानना,

उन्हें ज़लील और छोटा ना समझना उनकी हर बात जो क़तई और यकीनी तौर पर साबित हो उससे हक़ जानना

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को क़ातिमून नाबिईन मानना उनके बाद किसी नबी के पैदा होने को जाइज़ ना समझना,

क़ियामत, हिसाब व किताब और जन्नत व दोज़क को हक़ मानना,

नमाज़ व रोज़ा और हज व ज़कात की फरजियात को तस्लीम करना,

जीना, चोरी और शराब नोशी वगैरा हराम क़तई की हुरमत का इतिक़ाद करना और काफिर को काफिर जानना वगैरा.

सवाल: किसी से शिर्क या कुफ्र हो जाये तो क्या करे?

जवाब: तौबा और तज्दीदे ईमान करे बीवी वाला हो तो तज्दीदे निकहा करे और मुरीद हो तो तज्दीदे बैयत भी करे.

सवाल: शिर्क और कुफ्र के अलावा कोई दूसरा गुनाह हो जाये तो माफ़ी की क्या सुरथ है?

जवाब: तौबा करे खुदाई तआला की बारगाह में रोये गीध गिड़ाये अपनी गलती पर नादिम व पशिमा हो और दिल में पक्का अहद करे के आउब कभी ऐसी गलती ना करूँगा,

सिर्फ ज़ुबान से तौबा तौबा कह लेना तौबा नहीं है.

सवाल: क्या हर क़िस्म का गुनाह तौबा से माफ़ हो सकता है?

जवाब: जो गुनाह किसी बन्दे ki हकतलफी से हो मसलन किसी का माल गज़ब कर लिया,

किसी पर तोहमत लगायी या ज़ुल्म किया तो इन गुनाहों की माफ़ी के लिए ज़रूरी है की पहले उस बन्दे का हक़ वापिस किया जाये या उससे माफ़ी मांगी जाये,

फिर खुदाई तआला से तौबा करे तो माफ़ हो सकता है.

और जिस गुनाह का ताल्लुक़ किसी बन्दे की हकता’लाफ़ी से नहीं है बल्कि सिर्फ खुदाई तआला से है,

उसकी दो क़िस्मे है एक वो जो सिर्फ तौबा से माफ़ हो सकता है

जैसे शराब नोशी का गुनाह और दूसरे वो जो सिर्फ तौबा से माफ़ नहीं हो सकते है जैसे नमाज़ों के आ पढ़ने से गुनाह इसके लिए ज़रूरी है

की वक़्त पर नमाज़ों के अदा न करने का जो गुनाह हुवा उससे तौबा करे और नमाज़ों की क़ज़ा पढ़े अगर आकिरी उम्र में कुछ क़ज़ा रह जाये तो उनके फिदियाः की वसीयत कर जाये.

Follow Us

हमारा फेसबुक पेज लाइक करने के लिए यहाँ क्लिक करें…

अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

ISLAMIC PALACE को लाइक करने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। जिन्होंने लाइक नहीं किया तो वह इसी तरह की दीन और इस्लाम से जुड़ी हर अहम बातों से रूबरू होने के लिए हमारे इस पेज Islamic Palace  को ज़रूर लाइक करें, और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को शेयर के ज़रिये पहुंचाए। शुक्रिया

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.