किन किन चीज़ो से रोज़ा नहीं टूटता है

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Junbi Ke Liye Roze Ka Waqt
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Doran e Roza Kaan Mein Paani Jaane Ka Hukm

किन किन चीज़ो से रोज़ा नहीं टूटता है

वह क्या बात है माहे रमज़ान की  के 21 हरुफो की निस्बत से रोज़ा न तोड़ने वाली चीज़ो के मुताल्लिक 21 पर

(1) भूल कर खाया, पिया या जिम्मा किया रोज़ा फ़ासिद न हुआ खुवाह वह रोज़ा फ़र्ज़  हो या नफ़्ल!

किन किन चीज़ो से रोज़ा नहीं टूटता है

(2) किसी रोज़ादार को इन अफजल में देखे तो याद दिलाना वाजिब है!

है अगर रोज़ा दार बहुत  ही कमज़ोर हो की याद दिलाने पर वह खाना छोर्ड देगा जिस की वजह से कमज़ोरी इतनी बढ़ जाएगी

की उसके लिए रोज़ा रखना ही दुश्वार हो जायेगा और अगर खा लेगा तो रोज़ा भी अच्छी तरह पूरा कर लेगा और दीगर इबादते भी बा खूबी अदा कर सकेगा

(और चूँकि भूल कर खा पि रहा है इस लिए इसका रोज़ा तो हो ही जायेगा) लिहाज़ा इस सूरत में याद न दिलाना ही बेहतर है!

बाज़ मशाइखे किराम फरमाते है: जवान को देखे तो याद दिला दे और बूढ़े को देखे तो याद न दिलाने में हर्ज़ नहीं!”

मगर यह हुक्म अक्सर के लिहाज़ से है कियोंकि जवान अक्सर क़वी (यानी ताक़तवर) होते है और बूढ़े अक्सर कमज़ोर!

चुनांचे असल हुक्म यही है की जवानी और बुढ़ापे को कोई दखल नहीं, बल्कि कुव्वत व ज़ोफ़ (यानी ताक़त और कमज़ोरी) का लिहाज़ है

लिहाज़ा अगर जवान इस क़दर मज़ोर हो तो याद न दिलाने में हर्ज़ नहीं और बूढ़ा क़वी (यानी ताक़त वार) हो तो याद दिलाना  वाजिब है!

(रद्दुल मुहतार जिल्द ३ सफ़्हा 365)

(3) रोज़ा याद होने के बा वजूद भी मख्खी या गुबार या धुआँ हलक  में चले जाने से रोज़ा नहीं टूटता!

खुवाह गुबार आता का हो जो चक्की पीसने या आता छानने में उड़ता है या गल्ले का गुबार हो या हवा से खाक उधि या जानवरो के खुर या टाप से!

(दर्रे मुख़्तार रद्दुल मुहतार जिल्द 3 सफ़्हा 366)

(4) इसी तरह बस या कार का धुआँ या उनसे गुबार उड़ कर हलक में पहुंचा अगरचे रोज़ादार होना याद था रोज़ा नहीं टुटा !

(5) अगरबत्ती सुलग रही है और उसका धुआँ नाक में गया तो रोज़ा नहीं  टूटेगा! है

अगर लुबान या अगरबत्ती सुलग रही हो और रोज़ा याद होने के बा वजूद मुँह करीब ले जाकर उसका धुआँ नाक से खींचा तो रोज़ा फ़ासिद हो जायेगा

(रद्दुल मुहतार जिल्द3 सफ़्हा 366)

(6) भारी सिंगी लगवाई या तेल या सुरमा लगाया तो रोज़ा न गया अगरचे तेल या सुरमा का मज़ा हलक में महसूस होता हो बल्कि थूक में सुरमे का रंग भी दिखाई देता हो जब भी रोज़ा नहीं टूटेगा

( अल जो हर चन्नय्यारह  जिल्द 1 सफ़्हा 179)

(7) गुसल किया और पानी की खुनकी ( यानी ठंडक) अंदर महसूस हुई जब भी रोज़ा नहीं टुटा .

(आलमगीरी जिल्द १सफ़्हा 367)

(8) कुल्ली की और पानी बिलकुल फेंक दिया सिर्फ कुछ तरी मुँह में बाकि रह गयी  थी थूक के साथ इसे निगल लिया रोज़ा नहीं टुटा
(ezan)

(9) कान में पानी चला गया जब भी रोज़ा  नहीं टुटा! बल्कि खुद पानी डाला जब भी न टुटा

(दर्रे मुख़्तार जिल्द 3 सफ़्हा 367)

(11) तिनके से कान खुजाया और उसपर कान का मेल लग गया फिर वही  मेल लगा हुआ तिनका कान में डाला अगरचे चंद बार ऐसा किया हो जब भी रोज़ा न टुटा

(ezan)

( 12) दांत या मुंह में ख़फ़ीफ़ ( यानी मामूली) चीज़ बे मालूम सी रह गयी की लुआब के साथ खुद ही उतार जाएगी और वह उतार गयी रोज़ा नहीं टुटा !

(ezan)

(13) दांतो से खून निकल कर हलक तक पोहचा मगर हलक से निचे न उतरा  तो रोज़ा न गया

(फत्हुल क़दीर जिल्द 2सफ़्हा 258)

(14) मक्खी हलक में चली गयी रोज़ा न गया और क़सदन (यानी जानबुज कर) निगलि तो चला गया!

(आलमगीरी जिल्द 1 सफ़्हा 203)

(15) भूले से खाना खा रहे थे याद आते ही लुक्मा फेंक दिया या पानी पी रहे थे याद आते ही मुंह का पानी फेंक दिया तो रोज़ा न गया!

अगर मुंह का लुक्मा या पानी याद आने के बा वजूद निगल गए तो रोज़ा गया!

( ezan)

(16) सुबहे सादिक़ से पहले खा या पी रहे थे और सुबह होते ही (यानी से-हरि का वक़्त ख़त्म होते ही) मुंह का सब कुछ उगल दिया तो रोज़ा न गया,

और अगर निगल लिया तो जाता रहा !

(आलमगीरी जिल्द 1 सफ़्हा 203)

(17) : ग़ीबत की तो रोज़ा न गया !(दर्रे मुख़्तार

(जिल्द 3 सफ़्हा 362)

अगरचे ग़ीबत सख्त कबीरा गुनाह है! क़ुरान ए करीम में ग़ीबत करने की निस्बत फ़रमाया,

“जैसे अपने मुर्दा भाई का गोश्त  खाना,” और हदीसे पाक में फ़रमाया ” ग़ीबत जीना से भी सख्त तर है!

(अत्तरगीब वत्तर्हिब जिल्द 3,सफ़्हा 331 हदीस 24)

ग़ीबत की वजह से रोज़े की नुरानिययत जाती रहती है!

(बहरे शरीअत हिस्सा 5 सफ़्हा 611)

(18) : जनाबत (यानी गुसल फ़र्ज़ होने) की हालत में सुबह की बल्कि अगर सारे दिन जुनुब (यानी बे गुसल) रहा रोज़ा न गया

(दर्रे मुख़्तार जिल्द 3 सफ़्हा 372)

अगर इतनी देर तक क़सदन ( यानी जानबूझकर) ग़ुस्ल न करना की नमाज़ कज़ा हो जाये गुनाह वे हराम है

हदीस शरीफ में  फ़रमाया, जिस घर में जुनुब हो उसमे रेहमत के फरिश्ते नहीं आते !”

(बहरे शरीअत हिस्सा 5 सफ़्हा 116)

(19): तिल या तिल के बराबर कोई चीज़ चबाई और थूक के साथ  हलक़ से उतर गयी तो रोज़ा न गया मगर जब की उसका मज़ा हलक़ में महसूस होता हो तो रोज़ा जाता रहा!

(फ़तहुल क़दीर जिल्द 2 सफ़्हा 259)

(20): थूक या बलगम मुंह में आया फिर उसे निगल गए तो रोज़ा न गया

( रद्दुल मुहतार जिल्द 3 सफ़्हा 373)

(21): इसी तरह नाक में रेंट जमा हो गयी, साँस के ज़रिये खिंच कर निगल जाने से भी रोज़ा नहीं जाता!

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