चाँद देखने का बयान

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चाँद देखने का बयान

ए मेहबूब तुम से चाँद के बारे में सवाल करते हैं,

तुम फार्मा दो वो लोगों के कामो और हज के लिए अवक़ात हैं

(القرآن، الجزء-2، سورة البقرة-189)

हदीस चाँद देख कर रोज़ा रखना शुरू करो चाँद देख कर अफ्तार करो और अगर अबार) बदल (हो तो शाबान की गिनती 30 की पूरी करो )

صحیح البخاري، كتاب الصوم، الحديث-1909)

( हदीस उम्मुल मोमिनीन हज़रत ऐसा सिद्दीक़ा रदिअल्लहु अन्हा से रिवायत है

रसूल صلى الله عليه وسلم शाबान के महीने की इस क़दर हिफाज़त करते की इतनी किसी और महीने की नहीं करते.

फिर चाँद देख कर रामज़ा के रोज़े शुरू करते. अगर अबार होता तो 30 दिन शाबान के पुरे कर के रमजान का रोज़ा रखते.)

سنن أبي داود، كتاب الصيام، باب إذا أغمي الشهر، الحديث-2325

(मसला: 5 महीनो का चाँद देखना वाजिब किफ़ायत है,

शाबान रमजान शव्वाल ज़ी क़दह ज़िल हिज्जः शाबान का इस लिए की अगर रमजान का चाँद देखते वक़्त अबार या गुबार हो तो ये 30 की गिनती पूरी कर के रमजान शुरू करे,

और रमजान का इस लिए की रोज़ा रखना है,शव्वाल का इस लिए की रोज़ा ख़त्म करना है,

और ज़ी क़दह का इस लिए की ज़िल हज्ज में चाँद देखना है और ज़िल हज्ज का इस लिए की बकरा ईद करनी है

الفتاوى الرضوية، جلد-10، صفحہ-४५१

किसी ने रमजान या ईद का चाँद देखा मगर उसकी गवाही क़ुबूल न हुई फ़ासिक़ )दाढ़ी कट्टा, या खुले आम गुनाहे कबीरा करने वाला फ़ासिक़ है

( होने की वजह से या किसी एक ही आदमी ने चाँद देखा और उसकी गवाही मानी नहीं गई तो अब ये भी रोज़ा रखे अगरचे इसने चाँद देखा हो,

इसको रोज़ा तोडना जायज़ नहीं , और तोड़ेगा तो कफ़्फ़ारा लाज़िम नहीं )

(बहार-ए-शरीअत, हिस्सा-5, पेज-९७५)

(मसला: अबार और गुबार में रमजान का सबूत एक मुसलमान आक़िल बालिग़ मस्तूर या आदिल शख्स से हो जाता है,

चाहे वो मर्द हो या औरत आज़ाद हो या बांदी, या उसपे जीना की हद जारी हो चुकी हो जब की तौबा कर लिया हो

(बहार-इ-शरीअत, हिस्सा-5, पेज-975)

आदिल होने का मना ये है की काम से काम मुत्तक़ी हो यानि बड़े गुनाहो से बचता हो और छोटे गुनाह हमेशा न करता हो,

और ऐसा काम न करता हो जो मुरव्वत के खिलाफ हो मसलन बाजार में खाना (बहार-ए-शरीअत) एक जगह चाँद हुवा तो वो सिर्फ वही के लिए नहीं बल्कि तमाम जहाँ के लिए है

मगर दूसरी जगह के लिए इस का हुक्म उस वक़्त है के उन के नज़ज़दीक उस दिन तारीख में चाँद होना शरई सबूत से साबित हो जाये

यानी देखने की गवाही या काज़ी के हुक्म की शाहदत गुज़रे या मुताद्दिद जामतें वह से एक खबर दें के फलां जगह चाँद हुवा है और वह लोगो ने रोज़ा रखा या ईद की है

(बहरे शरीअत) अगर किसी जगह दुसरे मुल्क या दुसरे शहर की रूयत इ हिलाल शरई तौर पर अपने तमाम शराइत के साथ साबित हो जाये तो वहां के लोगों पर उसके मुताबिक़ अमल करना ज़रूरी हो जायेगा,

यानी

1. शहादत,

2. शहादत अलष शहादत,

3. शहादत ालाल क़ज़ा,

4. किताबुल क़ाज़ी ईलाल क़ाज़ी,

5. इस्तिफ़ादा,

से इसलिए के अगरचे बाज़ लोगों के नज़दीक इख्तिलाफ ए मटाले’ मोतबर है लेकिन ज़ाहिरूर रिवायत और ाहवत यही है क वह मोतबर नहीं यहाँ तक क अहले मग़रिब की रूयत अगर अहले मशरिक़ पर बतरीक़ा ए इजाब साबित हो

जाये तो उसके मुताबिक़ उन पर अमल लाज़िम हो जायेगा, بحر الرائق جلد دوم صفحہ 270 میں ہے: “یلزم اہل المشرق برویة اہل المغرب و قیل یعتبر فلا یلزمھم برویة غیرھم اذا اختلف المطالع و ھو الاشبه کذا فی تبیین و الاول ظاھر الروایة و ھو الاحوت کذا فی

فتح القدیر و ھو ظاھر المذہب و علیه الفتویٰ کذا فی الخلاصة”

(फतवा फ़क़ीह इ मिल्लत, वॉल:1, पेज:336, फ़क़ीह इ मिल्लत अकादमी, बस्ती)

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