रोज़े की कज़ा और कफ़्फ़ारा लाज़िम होने का बयान

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Kitab: Faizan e Mairaj (Urdu)
Kitab: Faizan e Mairaj (Urdu)
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ROZE KI KAZA AUR KAFFARA LAZIM HONE KA BAYAN

रोज़े की कज़ा और कफ़्फ़ारा लाज़िम होने का बयान

यह सोचा था की सुबह न हुई और खाया, पिया. बाद में मालूम हुआ की सुबह हो चुकी थी तो सिर्फ कज़ा लाज़िम है यानी रोज़े के बदले एक रोज़ा रखना होगा.

यह सोच कर के की सूरज डूब गया है रोज़ा इफ्तार कर लिया हलाकि सूरज डूबा न था तब भी कज़ा लाज़िम है.

कफ़्फ़ारा नहीं औरत रोज़दार सो रही थी. सोते में उससे सोहबत की गयी तो इस सूरत में उसपर सिर्फ कज़ा लाज़िम है.

कफ़्फ़ारा नहीं.भूल कर खाया-पिया उसे उलटी हो गयी. और यह ख्याल किया की रोज़ा जाता रहा अब चाह कर खा पि लिया तो सिर्फ कज़ा फ़र्ज़ है.

आंसू मुँह में चला गया और निगल गयी अगर 1-2 बूंदे है तो रोज़ा न गया.

और ज्यादा था की उसकी नमकीनी पुरे मुँह में महसूस हुई तो रोज़ा जाता रहा.

पसीने का भी यही हुक्म है रोज़े में दन्त उखड़वाया और खून निकल कर हलक से निचे उतरा अगरचे सोते में ऐसा हुआ तो रोज़ा जाता रहा.

उसकी कज़ा लाज़िम है,कान से मेल निकला और मेल लगी हुई सलाई दूसरी या तीसरी मर्तबा कान में की रोज़ा न जायेगा की कान कुरेदने में सलाई दिमाग तक नहीं जाती.

नथनों से दवा चढ़ाई या कान में तेल डाला या तेल चला गया. रोज़ा जाता रहा और पानी कान में चला गया या डाला रोज़ा बाकि है.

कुल्ली कर रही थी बिला इरादा पानी हलक से उतर गया या नाक में पानी चढ़ाया और दिमाग में चढ़ गया.

रोज़ा जाता रहा. है अगर वह अपना रोज़दार होना भूल गयी तो न टूटेगा. अगरचे इरादे से हो.

अगरबत्ती वगैरह की खुशबु सुलगती थी उसने मुँह करीब करके धुए को नाक से खींचा या खुद चाह कर हलक तक धुआँ पहुंचाया या वह किसी चीज़ का धुआँ हो और किसी तरह पहुंचाया हो रोज़ा जाता रहा.

सुखी ऊँगली औरत ने शर्मगाह में राखी तो रोज़ा न गया. है अगर ऊँगली शर्मगाह की अंदरूनी रतूबत (तरी) से ऐसे भीग गयी की अब उसकी गन्दगी छूट कर दूसरे चीज़ में लगे.

उसके बाद ऊँगली बाहर कर के ऐसे ही गन्दगी के हालत में फिर अंदर की, की गन्दगी छूट कर शर्मगाह के भीतरी हिस्से में लगी तो रोज़ा जाता रहा.

यही अगर ऊँगली पानी या तेल या दूध या घी या थूक में ऐसे भीगी थी की उस की तरी छूट कर फर्ज़े दाखिल में लगे और औरत ने अपनी शर्मगाह में किसी बिना पर दाखिल की तो रोज़ा फ़ासिद हो जायेगा.

यही अगर औरत ने अपनी शर्मगाह में पानी या तेल टपकाया तो रोज़ा जाता रहा.

दबाव के साथ इस्तिंजा किया यहाँ तक की हुकना रखने की जगह तक पानी पहुँच गया तो रोज़ा जाता रहा और इतना दबाव चाहिए भी नहीं की इससे सख्त बीमारी का खतरा है.

सेहरी में ज्यादा खा लिया की अब दिन में खट्टी डकार आ रही है तो इससे रोज़ा नहीं जाता.

फ़तवा पान खाकर सो गई और सुबह उठ कर रोज़ा की नीयत की तो अगर पान खा लिया था.

मुँह में सिर्फ चाँद देने छलिया के दन्त में हलके रह गए तो रोजा सही हो जायेगा.

और अगर सुबह के बाद भी मुँह में उगाल मौजूद था की उसके आरक (रस) का थूक के साथ मुँह में जाने का पूरा यकीन है

तो अब रोज़ा न होगा. दौरा बता, उसे भीगने के लिए मुँह पर फेरा. फिर दोबारा, टी बारे यही किया,

रोज़ा न जायेगा. मगर जबकि दौरे से कुछ रतूबत (नमी) अलग हो कर मुँह में रहा और थूक निंगाल लिया तो रोज़ा जाता रहा.

यही मुँह में रंगीन दौरा रखा जिस से थूक रंगीन हो गया. फिर थूक निंगाल गया तो रोज़ा जाता रहा.

सुखी दवा कपडे में बांध कर शर्मगाह में रखी की वह कपडे से छान कर भीतरी हिस्से में गिरे. या दवा ऐसी गीली हो की कपडे में से टपक कर फर्ज़े दाखिल में लगे.

या हिलने के सबब कपडा चढ़ा जाये की बिलकुल फर्ज़े दाखिल के अन्दर गायब हो जाये तो इन सुरतो में रोज़ा जाता रहेगा.

रोज़े की हालत में (रमजान) या गैर रमदान) किसी जरुरत के तहत कोई दवा सुखी या गीली, रोटी या कपडा चाहे कोई चीज़ औरत ने पेशाब के रास्ते में इस तरह रखी की शर्मगाह के अंदरूनी हिस्से (फरूज़े दाखिल) के अन्दर बिलकुल गायब कर दी तो रोज़ा जाता रहा.

और अगर दवा किसी कपडे में बांध कर शर्मगाह में इस तरह रखी की कपडे का सिरा फरूज़े दाखिल से बहार रहा अगरचे शर्मगाह के बहरी पर्दे (फरूज़े खारिज) में गायब हो जाये तो रोज़ा न जायेगा.

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