हिजरत-ए-मदीना का ज़िक्र (किसे हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

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HIJRAT-E-MADINA KA ZIKR (QISA HAZRAT MUHAMMAD SALLALLAHU ALAIHI WASALLAM)
sallallahu alaihi wasallam
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HIJRAT-E-MADINA KA ZIKR (QISA HAZRAT MUHAMMAD SALLALLAHU ALAIHI WASALLAM)

हिजरत-ए-मदीना का ज़िक्र (किसे हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

हिजरत-ए-मदीना का ज़िक्र

फिर मक्का में ही रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को मेराज का वाक़िया पेश आया.

उस वक़्त क़ुरैश और मक्का में जगह जगह इस्लाम फैल चूका था हज़ूर पाक (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने असहाब की तकलीफ के मुतालिक परेशान रहते थे

और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हुक्म-ए-इलाही से सहाबा को हिजरत-ए-मदीना का हुक्म फार्मा चुके थे और खुद अपने मुतालिक मुन्तज़िर थे.

हज़रत आयेशा फरमाती हैं के आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हर रोज़ हज़रत अबू बक्र के घर सुबह या रात को तशरीफ़ ले जाते थे.

एक बार आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) दोपहर के वक़्त ए , तो अबू बक्र समझ गए के आज ज़रूर कोई खास बात है

हज़ूर ने फ़रमाया: ” मुझ को हिजरत की इजाज़त मिल गए है”

ये सुनन कर अबू बक्र मारे ख़ुशी के रोने लगे और अर्ज़ किया , मैं ने इसी दिन के लिए 2 ऊँटनीआन तैयार कर रखी हैं.

और फिर हज़ूर(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हिजरत फरमाने की खबर मक्का में लोगोँ को बिलकुल मालूम न हुए,

सिवाए अबू बक्र के घर वालोँ के और हज़रत अली के. हज़रत अली (R.A) को आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अमानतें वापिस करने के लिए अपने पीछे छोड़ दया था.

फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अबू बक्र के साथ घर के पीछे की खिड़की/ विंडो से निकल कर ‘घर-ए-सौर’ में जा ठहरे
.
अबू बक्र का घुलम बकरिओं को लेकर घर की तरफ आ जाता के वो दोनों दूध पी सकें और हज़रत आयेशा (R.A) की बहिन अस्मा खाना पका कर लती रहीं.

इस तरह 3 दिन आप दोनों ने घर में बसर कर दिए. इधर क़ुरैश ने सारा मक्का छान मारा मगर हज़ूर ﷺ किसी को न मिले. इस तरह लोगोँ का शोर काम हो गया.

तो आखरी दिन सामान बांधने की तैयारी हुए, उस में अस्मा ने उन दोनों की मदद की.

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