जुमा का दिन जुमा मुबारक कहना मुकमल बयान

0
124
JUMAH MUBARAK KAHNA BID'AH HAI
namaz
Islamic Palace App

JUMAH MUBARAK KAHNA BID’AH HAI

जुमा का दिन जुमा मुबारक कहना मुकमल बयान

जुमे के दिन मुबारकबाद देना हमारी (country) में एक (custom) बन गया है

(text messages) के ज़रिये जुमे के दिन एक दूसरे से मिलने पे हम एक दुसरे को”जुमा मुबारक”या “जुमा तैय्यिबह.” कहते हैं.

इस बात में कोई शक नहीं की जुमा मुसलमानो के लिए “ईद” से काम नहीं जैसा की हदीस में

इब्ने ‘अब्बास ( R.a) से रिवायत है

प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया यह ईद का दिन है अल्लाह तआला ने मुसलमानो को हुकुम दिया जो भी जुमे के लिए आये तो, अच्छे से ग़ुस्ल करे,

इत्र लगाए, और चाहिए के मिस्वाक का इस्तेमाल करे”

(Narrated by Ibn Maajah,1098;classed as Hasan by al-Albaani in Saheeh Ibn Maajah.)

इब्ने अल-क़य्यिम फरमाते हैं

यह ईद का दिन है जो हर हफ्ते आता है.

(ज़ाद अल-मआद, 1/369)

इस तरह मुसलमानो की तीन ईदें हैं ईद अल-फ़ित्र और ईद अल-आधा जो साल में एक बार अति हैं और जुमा जो हफ्ते में एक बार आता है.

(Secondly)

ईद अल- फ़ित्र और ईद अल-आधा के मौके पर एक दूसरे को मुबारक बाद दी जाती है

लेकिन सहाबाह से जुमे की मुबारकबाद देने की बात नहीं मिलती की वो एक दूसरे को मुबारकबाद देते थे.

सहाबाह को पता था, और वह हम से बहुत ज़्यादा कनौलेजाबले थे,

इसके फ़ज़ाइल के मुताल्लिक़, और वह जुमे के दिन का ख़ास एहतेमाम करते थे,

फिर भी ऐसा नहीं मिलता की उन्होंने कभी भी एक दूसरे को मुबारक बाद दी हो,

शेख सालिह इब्न फौजान से पुछा गया:

क्या हुकुम है जुमे के दिन मुबारकबाद के टेक्स्ट मेसेजे से भेजने से मुताल्लिक़ और जमुआह मुबारक कहने पर? उन्होनें जवाब दिया:

सहाबा एक दुसरे को जुमे की मुबारकबाद नहीं देते थे, तो हमें भी कुछ और इंट्रोडस नहीं करना है जो उन्होंने नहीं किया.

अजवाबत असलाह मजललत अल-दवाह अल-इस्लामियह.

क्यूंकि यह ज़िक्र और दुआ के तहत आता है जो की क़ुरान और सुन्नत से साबित होनी चाहिए क्यूंकि यह खालिस इबादा का मुआमला है

अगर यह सही होता तो हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और उनके सहाबाह हमसे पहले यह कर चुके होते .

अगर एक मुसलमान अपने भाई के लिए दुआ करे जुमे के दिन इस नियत से की उसका दिल नरम हो जाये

और उसे खुश करे और वह वक़्त तलाश करे जब दुआएं क़ुबूल होती हैं तो इसमें कोई ग़लत बात नहीं है.

जुमाह मुबारक कहने के बजाये. कोई भी दीनी अहकाम मैं डाउट हो तो देखना चाहिए की आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसा करने को कहा या नहीं इससे (related) कोई हदीस है

या नहीं अगर नहीं तो उसे फ़ौरन छोड़ दी क्योंकि उसी को बिदेह कहते हैं जो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने नहीं बताया दीन मैं करने को वो करना.

अल्लाह तआला हमें बिदेह से मेहफ़ूज़ रखे आमीन. और अल्लाह बेहतर जानने वाला है.

Follow Us

हमारा फेसबुक पेज लाइक करने के लिए यहाँ क्लिक करें…

अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

ISLAMIC PALACE को लाइक करने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। जिन्होंने लाइक नहीं किया तो वह इसी तरह की दीन और इस्लाम से जुड़ी हर अहम बातों से रूबरू होने के लिए हमारे इस पेज Islamic Palace  को ज़रूर लाइक करें, और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को शेयर के ज़रिये पहुंचाए। शुक्रिया

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.