तरावीह की ज़रूरी मसले, जानिए

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TARAWEEH KE ZAROORI MASLE
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TARAWEEH KE ZAROORI MASLE

तरावीह की ज़रूरी मसले

ईशा के फ़र्ज़ व वित्र के बाद भी तरावीह पढ़ी जा सकती है

(AD दुर्रुल मुख़्तार जिल्द 2 पेज 494)

जैसा की बाज़ अवक़ात 29 को रूयते हिलाल की शहादत मिलने में ताख़ीर के सबब ऐसा हो जाता है

बिला उज़ैर तरावीह बैठ कर पढ़ना मकरूह है बल्कि बाज़ फुक़हाए किराम के नज़दीक तो होती ही नहीं

(AD दुर्रुल मुख़्तार जिल्द 2 पेज 499)

न बालिग़ इमाम के पीछे सिर्फ न बालिगों ही तरावीह पढ़ सकते है

बालिग़ की तरावीह (बल्कि कोई भी नमाज़ हटता की नफल भी) न बालिग़ के पीछे नहीं होती अलग अलग मस्जिद में तरावीह पढ़ सकता है

जब की खात्मे क़ुरआन में नुकसान न हो मसलन 3 मसजिद ऐसी है की इन में हर रोज़ सवा पर पढ़ा जाता है तो तीनो में रोज़ाना बारी बारी जा सकता है

अगर 27 वि को (या इससे पहले) क़ुरआने पाक ख़त्म हो गया तब भी आखिरी रमजान तक तरावीह पढ़ते रहे की सुन्नते मुअकदा है

(आलमगीरी जिल्द 1 पेज 118)

बाज़ मुक़्तदी बैठे रहते है जब इमाम रुकू करने वाला होता है उस वक़्त खड़े होते है यह मुनाफिक़ीन की मुशाबेहत है

चुनांचे क़ुरआने पाक में इरशाद होता है

तर्जमा: कंज़ुल ईमान- और (मुनाफ़िक़) जब नमाज़ को खड़े हो तो हारे जी से

(सूरे निसा आयत न० 142)

रमजान शरीफ में वित्र जमाअत से पढ़ना अफ़ज़ल है मगर जिसने ईशा के फ़र्ज़ बगैर जमाअत के पढ़े वोह वित्र भी तनहा पढ़े

(बहारे शरीअत हिस्सा 4 पेज 36)

एक इमाम के पीछे ईशा के फ़र्ज़ दूसरे इमाम के पीछे तरावीह और तीसरे इमाम के पीछे वित्र पढ़े

इसमें हरज नहीं हज़रते सय्यिदना उम्र फ़ारूक़ी आज़म (रदिययालहु अन्हु) फ़र्ज़ व वित्र की जमाअत कर वाते थे

और हज़रते सय्यिदना उबय इब्ने काब (रदिययालहु अन्हु) तरावीह पढ़ते

(आलमगीरी जिल्द 1 पेज 116)

तरावीह और शबीना का 1 ज़रूरी

मसला: (इसे ज़रूर पढ़िए इन्शा अल्लाह गलती की इस्लाह होगी) आयते सजदा पढ़ने या सुनने से सजदा वाजिब हो जाता है

पढ़ने में यह शर्त है की इतनी आवाज़ में हो की अगर कोई उज़ैर न हो तो खुद सुन सके, सुनने वाले के लिए यह ज़रूरी नहीं के बिला क़सद सुनी हो बिला क़सद सुनने से भी सजदा वाजिब हो जाता है

(आलमगीरी जिल्द 132)

खबरदार! होशियार! रमज़ानुल मुबारक में तरावीह या शबीना में अगरचे शरीक न हो बेशक अपनी ही अलग नमाज़ पढ़ रहे

हो आयते सज्दा सुन लेने से आप पर भी सज्दे तिलावत वाजिब हो जाएगा काफिर या न बालिग से आयते सज्दा सुनी तब भी सजदे तिलावत वाजिब हो गया

बालिग़ होने के बाद जितनी बार भी आयते सज्दा सुन कर अभी तक सज्दा न किया हो उनका गलबै जान के एतिबार से हिसाब लगा कर उतनी बार बा वुज़ू सजदे तिलावत कर लीजिये

सजदा-ए-तिलावत का तरीक़ा: खड़ा हो कर अल्लाहु अकबर कहता हुवा सजदे में जाये और कम से कम 3 बार “सुबहाना रब्बियल आला” कहे फिर “अल्लाहु अकबर कहता हुवा खड़ा हो जाये

(आलमगीरी जिल्द 1 पेज 135)

सजदे तिलावत के लिए अल्लाहु अकबर कहते वक़्त न हाथ उठाना है न इसमें तशह्हुद है न सलाम

(तन्वीरुल अबसर M’A रद्दुल मुहतार जिल्द 2 पेज 580)

जो सच्चे दिल और सही अक़ीदा के साथ रमजान में तरावीह पढ़े तो उसके अगले गुनाह बख्श दिए जाते है

(मुस्लिम)

मसला बिला उजरा तरावीह बैठ कर पढ़ना मकरूह है बल्कि बाज़ फ़िक़ह ए किराम के नज़दीक तो होती ही नहीं

(दर्रे मुख्तार)

मसला: तरावीह का वक़्त ईशा के फ़र्ज़ पढ़ने के बाद से सुबह सादिक़ तक है,

ईशा के फ़र्ज़ अदा करने से पहले अगर पड़ली तो न होगी.

(आलमगीरी) हज़रत अली और सलमान फ़ारसी की शागिर्द हज़रत अली बिन राबिया रमजान में लोगो को 20 रकत तरावीह और 3 रकत वित्र पढ़ते थे

(इब्न-ए-शैबा) सरकार गॉस-ए-आज़म फरमाते हैं: नमाज़-ए-तरावीह नबी-ए-करीम की सुन्नत हैं और 20 रकाते हैं

(तालीबिन जिल्द 2 सफ़ा 16)

तरावीह 20 रकअत सुन्नत-ए-मोकेदा नमाज़े हैं जो रमजान में पढ़ी जाती हैं ईशा की फ़र्ज़ नमाज़ की बाद, हर रात में

(क़ानून-ए-शरीअत)

मसला: जब 2-2 रकत कर के पढ़ रहा है तो हर 2 रकअत पर अलग अलग निय्यत करे अगर 20 रकअत की एक साथ निय्यत की तब भी जाइज़ है.

(दर्रे मुख़्तार)

शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस फरमाते हैं: तरावीह की तादाद 20 हैं इसकी वजह ये हैं

की सहाबा ने नबी-ए-करीम को पढ़ते देखा (हुज्जतुलबलीग़) हज़रत इमाम गाज़ली फरमाते हैं:

तरावीह 20 रकअते हैं जिन का तरीक़ा मशहूर व मारूफ हैं और ये सुन्नते मौकेदा हैं

(अह्या-उल उलूम)

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