क्या दूर दराज़ के इलाक़ो मै रोज़ा और लैलतुल क़द्र मै फ़र्क़ हो सकता है, (जैसे इंडिया और सऊदी)

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Kya Door Daraaz Ke Ilaaqo Mai Roza Aur Laylatul Qadr Mai Farq Ho Sakta Hai, (Jaise India Aur Saudi)
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Kya Door Daraaz Ke Ilaaqo Mai Roza Aur Laylatul Qadr Mai Farq Ho Sakta Hai, (Jaise India Aur Saudi)

सवालात ए रमजान

क्या दूर दराज़ के इलाक़ो मै रोज़ा और लैलतुल क़द्र मै फ़र्क़ हो सकता है, (जैसे इंडिया और सऊदी)

करीब रहमतुल्लाह फरमाते हैं,

उम्मे फज़ल बिन्ते हारिस ने उन्हें हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के पास शाम भेजा, फरमाते हैं,

मैं शाम आया और उनका दिया हुआ काम पूरा किया, अभी मैं शाम ही में था के रमजान का चाँद नज़र आ गया,

मायने जुमा की रात चाँद देखा,फिर महीने के आखरी दिनों मै मदीना पहुँच गया,

अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने दौरान गुफ्तगू चाँद का ज़िक्र किया और मुझसे पूछा-तुमने (शाम में) चाँद कब देखा?

मैंने कहा- हमने जुमा की रात को चाँद देखा था,

उन्होंने पूछा- क्या तुमने खुद देखा था? मैंने कहा- हाँ, और लोगों ने भी देखा और रोज़ा रखा और मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु ने भी रोज़ा रखा,

इस पर उन्होंने कहा- लेकिन हमने तो शनिचर (हफ्ते) की रात चाँद देखा था,

सो हम बराबर रोज़ा रखते चले जायेंगे यहाँ तक के 30 की गिनती पूरी कर ले या चाँद देख ले,

मैंने पूछा- क्या आपके लिए मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की रोयत और उनका रोज़ा रखना काफी (दलील) नहीं है?

आपने जवाब दिया- नहीं, रसूलुल्लाह ने हमे ऐसा ही हुक्म दिया है।

मुस्लिम 28 (1087)

इससे पता चलता है इस्लाम में चाँद का एतेबार है,

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