रोज़े में क़ज़ा कब लाज़िम होती है जानिए

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Roze Me Kaza Kab Lazim Hoti Hai Janiye
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Roze Me Kaza Kab Lazim Hoti Hai Janiye

रोज़े की क़ज़ा

अब हम कुछ उन सूरतों का ज़िक्र क्र रहे है जिनमें रोज़ा टूट जाने पर

सिर्फ क़ज़ा लाज़िम होती है। क़ज़ा लाज़िम होने का

मतलब है कि उस रोज़े के बदले में सिर्फ एक रोज़ा रखना पड़ेगा।

. यह सोच कर कि सहरी का वक़्त बाकि है कुछ खा-पी लिया

या बीवी से सोहबत कर ली और बाद में मालूम हुआ कि

सहरी का वक़्त ख़तम हो गया था

तो रमजान के बाद एक रोज़ा क़ज़ा रखें।

. इसी तरह यह सोचकर कि सूरज डूब चूका है

रोज़ा इफ्तार कर लिया तब भी एक रोज़ा क़ज़ा रखें।

. खाने-पिने के लिए मजबूर किया गया यानि ज़बरदस्ती या

सख्त धमकी देकर खिलाया गया चाहे अपने ही हाथ से

खाया हो तो सिर्फ क़ज़ा लाज़िम है।

. भूलकर कुछ खाया पिया य भूले में कोई ऐसा काम हो गया

जिससे रोज़ा टूट जाता है, इन सब सूरतों में यह सोचकर कि

रोज़ा टूट गया है जानबूझ कुछ खा लिया तो सिर्फ क़ज़ा लाज़िम है।

. बच्चे की उम्र दस साल की हो जाए

और उसमें रोज़ा रखने की ताक़त हो तो उससे रोज़ा रखवाया जाए न रखें तो मार कर रखवायें।

अगर बच्चा रोज़ा रखकर तोड़ दे तो क़ज़ा का हुक्म नहीं दिया जायेगा

और नमाज़ तोड़े तो फिर पढ़वाये।

(रमज़ानुल मुबारक, फ़ज़ाइल और मसाइल, साफा न० 19)

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