सूरह इख़लास में मुकम्मल तौहीद और हर तरह के शिर्क से नफ़ी है

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Surah Ikhlas Me Mukammal Tawhid Or Har Tarah Ke Shirk Se Nafi Hai
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Surah Ikhlas Me Mukammal Tawhid Or Har Tarah Ke Shirk Se Nafi Hai

सूरह इख़लास में मुकम्मल तौहीद और हर तरह के शिर्क से नफ़ी है

बिस्मिल्ला हिर्रहमानिर्रहीम

अलहमदु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन,वस्सलातु वस्सलामु अला आलिहि व असहाबिहि अजमईन

सूरह इख़लास में मुकम्मल तौहीद और हर तरह के शिर्क से नफ़ी है

सूरतुल इख़लास का आसान तर्जुमा:

ऐ मोहम्मद! कह दो अल्लाह तआला एक है। अल्लाह तआला बे नियाज़ है, यानि सब उसके मोहताज हैं, वह किसी का मोहताज नहीं। ना उसकी कोई औलाद है और ना वह किसी की औलाद है और उसके जोड़ का कोई भी नहीं, यानि उस जैसा कोई भी नहीं है, क्योंकि वही ख़ालिक़े हक़ीक़ी व माबूदे हक़ीक़ी है, बाक़ी कायनात का ज़र्रा ज़र्रा उसकी मख़लूक है।

शाने नुज़ूल:

इस सूरत के मक्की या मदनी होने में इख़्तिलाफ़ है। कुछ अहादीस में मज़कूर है कि मुशरिकीने मक्का ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा अपने रब का नसब हमें बयान कीजिए। इस पर यह सूरत नाज़िल हुई। कुछ रिवायात में है कि यहूदियों के एक गिरोह ने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा कि अपने रब के मुतअल्लिक बतायें कि वह रब कैसा हैजिसने आपको भेजा है। इस पर यह सूरत नाज़िल हुई।

गर्ज़ कि मुख़्तिलफ़ मौक़ो पर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से उस माबूद से मुताल्लिक सवाल किया जिसकी इबादत की तरफ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगो को दावत दे रहे थे। हर मौक़े पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हुक्म से उनके जवाब में यही सूरत सुनाई। अलबत्ता सबसे पहले यह सवाल मुशरिकीने मक्का ने किया थाऔर उनके जवाब में ही यह सूरत (सुरतुल इख़लास) नाज़िल हुई थी।

अल्फाज़ की तहक़ीक़:

(क़ुल) इसके अव्वलीन मुख़ातब तो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं क्योंकि आप ही से सवाल किया गया था कि आप का रब कौन है और कैसा है? लेकिन हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद हर मुसलमान इसका मुख़ातब है, यानि हर मुसलमान की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अल्लाह तआला की वहदानियत को बयान करे। (हु अल्लाहु अहद) अल्लाह उस ज़ाते अक़्दस का नाम है जो हमेशा से है और हमेशा रहेगा, जो यकता है, उसका कोई शरीक नहीं, जिसने अपनी क़ुदरत से यह पूरी कायनात बनाई हैऔर वही तन्हा इस पूरी कायनात के निज़ाम को चला रहा है। (अल्लाहुस्समद) अल्लाह तआला की पहली सिफ़त बयान की गयी कि वह समद है। समद लफ़्ज़ का मफ़हूम उर्दू के किसी एक लफ़्ज से अदा नहीं हो सकता। उसके मफहूम में दो बातें हैं कि सब उसके मोहताज हैंऔर वह किसी का मोहताज नहीं है। (लम यलिद वलम यूलद) ना उसकी कोई औलाद हैऔर ना वह किसी की औलाद है।

यह उन लोगों का जवाब है जिन्होंने अल्लाह तआला के नसबनामे का सवाल किया था कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को मख़लूक पर क़यास नहीं किया जा सकता हैजो तवालुद और तनासुल के जरिए वुजूद में आती है। कुछ इसमें उन लोगों की तरदीद है जो फरिश्तों को अल्लाह तआला की बेटियाँ कहते थेया हज़रत ईसा या हज़रत उजैर अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला का बेटा क़रार देते थे। (वलम युकुल्लहु कुफुवन अहद) कुफ़ू के लफ़्जी मायने मिस्ल और मुमासिल के हैं। यानि ना कोई उसका मिस्ल है और ना कोई उससे मुशाबहत रखता है। बात दरअसल यह है कि हम मौत को आजतक अपनी अक़्लों से नहीं समझ सके तो इस ज़ाते अक़्दस को अपनी अक़्लों से कैसे समझ सकते हैं जो ज़िन्दगी और मौत का ख़ालिक़ हो। उसके देखने, सुनने और हर तरह की ख़बर रखने को मख़लूक के सुननेऔर देखने पर क़यास नहीं किया जा सकता। हमें अल्लाह की ज़ात को समझने के लिए अल्लाह की मख़लूक़ात में ग़ौर करना चाहिए, मसलन सूरज, चांद, सितारे, आसमान, ज़मीन, पानी, हवा, आग, धूप, दरख़्त, पहाड़, जानवर, फल, सब्ज़ियां वगैरह कैसे वजूद में आ गये। खुद हमें अपने जिस्म के आज़ा पर भी ग़ौर करना चाहिए कि हमारे जिस्म का सारा निज़ाम कैसे चल रहा है। सिर्फ अंगूठे के निशान पर ग़ौर करें कि आज तक दो इन्सानों के अंगूठे का निशान एक जैसा नहीं हुआ।

ख़ुलासाए तफ़सीर:

इस सूरत की इन चार मुख़्तसर आयात में अल्लाह तआला की तौहीद को इन्तहाई जामे अन्दाज़ में बयान फ़रमाया गया है। पहली आयत (क़ुल हु अल्लाहु अहद) में उन लोगों की तरदीद है जो एक से ज़्यादा माबूदों के क़ायल हैं। दूसरी आयत (अल्लाहुस्समद) में उन लोगों को तरदीद है जो अल्लाह तआला को मानने के बावजूद किसी और को अपना मुश्किल कुशा और हाजत रवा तसलीम करते हैं। तीसरी आयत (लम यलिद वलम यूलद) में उन लोगों की तरदीद है जो फरिश्तों को अल्लाह तआला की बेटियाँ कहते थे,

या हज़रत ईसा या हज़रत उजैर अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला का बेटा क़रार देते थे। और चौथी (वलम यकुल्लहु कुफ़ुवन अहद) में उन लोगों की तरदीद है जो अल्लाह तआला की किसी भी सिफ़त में किसी और की बराबरी के क़ायल हैं। इस तरह मुख़्तसर सी सूरत ने शिर्क की तमाम सूरतों को बातिल क़रार देकर ख़ालिस तौहीद साबित की है। इसीलिए इस सूरत को सुरतुल इख़लास कहा जाता है।

सुरतुल इख़लास में मुकम्मल तौहीद और हर तरह के शिर्क से नफ़ी है:

इस सूरत में हर तरह के मुशरिकाना ख़्यालात की नफ़ी करके मुकम्मल तौहीद का सबक दिया गया है कि अल्लाह ही सारी कायनात का खालिक़, मालिक और रज़्ज़ाक है। वही हक़ीक़ी बादशाह है, वह हमेशा से है और हमेशा रहेगा। इसे ऊंघ भी नहीं आती है। वह ना कभी सोता है, ना खाता है और ना वह पीता है। उसका कोई शरीक नहीं है। अगर कायनात में दो रब होते तो दोनो का आपस में इख़्तिलाफ होने की वजह से दुनिया का निज़ाम कब का दरहम बरहम हो गया होता। वह इन्सान की शहरग से ज़्यादा क़रीब है।

वह हर शख्स के हर अमल से पूरी तरह वाकिफ़ है। वह कायनात के ज़र्रे ज़र्रे का इल्म रखता है। ना वह किसी की औलाद है और ना कोई उसकी औलाद है, बल्कि सब उसकी मखलूक हैं। इन्सान, जिन, चरिंद, परिंद, दरिंद सब उसके मोहताज हैं, वह किसी का मोहताज नहीं है। वह सब के बग़ैर सब कुछ करने वाला हैऔर पूरी कायनात मिलकर भी उसकी मर्ज़ी के बग़ैर कुछ नहीं कर सकती। हाजत रवा, मुश्किल कुशा और मसाइल हल करने वाली जात सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की है। वही मर्ज़ और शिफा देने वाला है। वही इज्ज़त व ज़िल्लत देने वाला है। वही ज़िन्दगी और मौत देने वाला है। उसी ने ज़िन्दगी और मौत को बनाया है ताकि वह आज़माये कि हम में से कौन अच्छे आमाल करने वाले हैं।

सुरतुल इख़लास के कुछ फज़ाईल नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बानी

सुरतुल इख़लास एक तिहाई क़ुरान के बराबर:

एक मर्तबा हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लोगों से फ़रमाया कि सब जमा हो जाओ, मैं तुम्हें एक तिहाई कुरान सुनाऊंगा। जो जमा हो सकते थे जमा हो गयेतो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ लाये और क़ुल हु अल्लाहु अहद यानि सुरतुल इख़लास की तिलावत फ़रमायी और इरशाद फ़रमाया कि यह सूरत एक तिहाई क़ुरान के बराबर है। (सही मुस्लिम)

हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रजि॰ ने एक दूसरे सहाबी (हज़रत क़तादा रजि॰) को देखा कि वह सूरह क़ुल हु अल्लाहु अहद बार बार दोहरा रहे हैं। सुबह हुई तो हज़रत अबू सईद खुदरी रजि॰ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने उसका ज़िक्र किया क्योंकि वह उसे मामूली अमल समझते थे (कि एक छोटी सी सूरत को बार बार दोहराया जाये)। हुजू़र अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: उस ज़ात की क़सम जिसके क़ब्जे में मेरी जान है। यह सूरत क़ुरान करीम के एक तिहाई के बराबर है। (सही बुख़ारी)

मज़कूरा बाला दीगर अहादीस में सुरतुल इख़लास को एक तिहाई क़ुरान के बराबर क़रार दिया है, जिसकी मुफस्सिरीन ने मुख़्तिलफ तौजीह बयान फ़रमायी हैं

1) क़ुरान करीम ने बुनियादी तौर पर तीन अक़ीदों पर ज़ोर दिया है: तौहीद, रिसालत और आख़िरत। इस सूरत में इन तीन अक़ीदों में से तौहीद के अक़ीदे की मुकम्मल वज़ाहत फ़रमायी गयी है। इसलिए इस सूरत को एक तिहाई क़ुरान कहा गया है।

2) क़ुरान करीम में तीन उमूर ख़ासतौर पर ज़िक्र किये गये हैं। अल्लाह की सिफ़ात, अहकामे शरिया और अंबियाए किराम व पहली उम्मतों के क़िस्से। इस सूरत में अल्लाह की जुमला सिफात को इजमाली तौर पर ज़िक्र किया गया है, यानि इस सूरत में तीन उमूर में से एक अम्र का मुकम्मल तौर पर इजमाली ज़िक्र आ गया है, इसलिए इस सूरत को एक तिहाई क़ुरान कहा गया है।

3) क़ुरान करीम के मायने और मफ़हूम तीन उलूम पर मुश्तमिल हैं। इल्मुत्तौहीद, इल्मुश्शराए और इल्मुलअख़लाक़ व तज़किया-ए-नफ़्स, इस सूरत में इल्मुत्तौहीद से मुतअल्लिक बयान किया गया है, इस वजह से सुरतुल इख़लास को नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक तिहाई क़ुरान के बराबर क़रार दिया है।

सुरतुल इख़लास की कसरत से तिलावत करने वाला अल्लाह का अज़ीज:

हज़रत आइशा रजिअल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक साहब को एक मुहिम पर रवाना किया। वह साहब अपने साथियों को नमाज़ पढ़ाते थे। और नमाज़़ में ख़त्म क़ुल हु अल्लाहु अहद पर करते थे। जब लोग वापस आये तो उसका तज़किरा हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से किया। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उनसे पूछो कि वह यह तर्ज़े अमल क्यों इख़्तियार किये हुए थे। चुनांचा लोगों ने पूछा तो उन्होंने कहा कि वह ऐसा इसलिए करते थे कि यह सिफ़त अल्लाह की ही और मैं उसे पढ़ना अज़ीज रखता हूँ। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि उन्हें बता दो कि अल्लाह भी उन्हें अज़ीज रखता है। (सही बुख़ारी)

सुरतुल इख़लास से सच्ची मोहब्बत करने वाला जन्नत में जायेगा:

हज़रत अनस बिन मालिक रजि॰ फ़रमाते हैं कि एक अन्सारी सहाबी मस्जिदे क़ुबा में हम लोगों की इमामत करते थे। उनकी आदत थी कि जब भी नमाज़ में सूरह फ़ातिहा के बाद कोई सूरत पढ़ने लगते तो पहले सुरतुल इख़लास पढ़ते फिर कोई दूसरी सूरत पढ़ते और हर रकअत में इसी तरह करते थे। उनके साथियों ने उनसे कहा कि क्या आप सुरतुल इख़लास पढ़ने के बाद यह सोचते हैं कि यह काफी नहीं जो दूसरी सूरत भी पढ़ते हैं। या तो आप यह सूरत पढ़ लिया करें या फिर कोई और सूरत। उन्होंने फ़रमाया मैं उसे (सुरतुल इख़लास की तिलावत) हरगिज़ नहीं छोड़ूंगा। अगर तुम लोग चाहते हो कि मैं तुम्हारी इमामत करूं तो ठीक है वरना मैं (इमामत) छोड़ देता हूँ।

वह लोग उन्हें अपने में सबसे अफ़जल समझते थे, लिहाज़ा किसी और की इमामत पसंद नहीं करते थे। चुनांचा जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ लाये तो उन्होंने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से यह क़िस्सा बयान किया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे पूछा तुम्हें अपने साथियों की तजवीज़ पर अमल करने से कौनसी चीज़ रोकती है? और क्या वजह है कि तुम हर रकअत में यह सूरत पढ़ते हो? उन्होंने ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! मैं इस सूरत से मोहब्बत करता हूँ। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: तुम्हे इस सूरत की मोहब्बत यकीनन जन्नत में दाखिल करेगी। (तिर्मिज़ी)

हज़रत अबू हुरैरा रजि॰ फ़रमाते हैं कि मैं हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ था कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किसी को सुरतुल इख़लास पढ़ते हुए सुना। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: वाजिब हो गयी। मैंने पूछा क्या वाजिब हो गयी? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: जन्नत। (तिर्मिज़ी) यानि जिसने इस सूरत के तक़ाज़ो पर अमल कर लिया तो वह इन्शाअल्लाह जन्नत में दाख़िल हो गया।

मुअव्वज़तैन की तरह सुरतुल इख़लास की तिलावत दुनियावी आफ़ात से हिफ़ाजत का ज़रिया:

हज़रत आइशा रजिअल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर रात जब बिस्तर पर आराम के लिये लेटते तो अपनी दोनो हथेलियों को एक साथ करके “क़ुल हु अल्लाहु अहद”, “क़ुल अऊज़ु बिरब्बिल फ़लक़”और “क़ुल अऊज़ु बिरबिलन्नास” पढ़ कर उनपर फूंकते थे और फ़िर दोनो हथेलियों को जहां तक मुमकिन होता अपने जिस्म पर फेरते थे। सर, चेहरा और जिस्म के आगे के हिस्से से शुरू करते। यह अमल आप तीन मर्तबा करते थे। (बुख़ारी)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन ख़ुबैब रजि॰ से रिवायत है कि एक रात में बारिश और सख़्त अंधेरा था, हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तलाश करने के लिए निकले, जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पा लिया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि कहो, मैंने अर्ज़ किया कि क्या कहूं, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, क़ुल हु अल्लाहु अहदऔर मुअव्वज़तैन तीन बार पढ़ो, जब सुबह और शाम हो, तीन मर्तबा यह पढ़ना तुम्हारे लिए हर तकलीफ़ से अमान होगा। (अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, नसई)

ख़ुलासाए कलाम:

जैसा कि क़ुरान व हदीस की रोशनी में ज़िक्र किया गया कि सुरतुल इख़लास क़ुरान करीम की एक अज़ीम सूरत है। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस सूरत को एक तिहाई क़ुरान के बराबर क़रार दिया हैजिसकी मुख़्तिलफ तौजीह बयान की गयी हैं। इस मुख़्तसर सी सूरत से मोहब्बत करने वालों और इसको एहतमाम से पढ़ने वालों को आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जन्नत की बशारत सुनाई है। मुअव्वज़तैन (सुरतुल फ़लक और सुरतुन्नास) के साथ सुरतुल इख़लास पढ़कर अपने ऊपर दम करने से कई आफ़ात से हिफ़ाजत मुमकिन है। इस सूरत में अल्लाह तआला की कई सिफ़ात बयान की गयी हैं, उन पर ग़ौर करें। अल्लाह की वैहदानियत का इक़रार करते हुए अल्लाह की जुमला सिफ़ात पर ईमान लायें और उसकी ज़ात व सिफ़ात में किसी को शरीक ना ठहरायें। नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज वगैरह तमाम बदनी व माली इबादात में सिर्फ अल्लाह की ज़ात की रज़ा मतलूब हो।


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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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