बिल’आखिर अल्लाह की राजा से हज़रत युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने अपनी पहचान ज़ाहिर करके अपने भाइयों और अब्बाजान याक़ूब (अलैहिस्सलाम) से मुलाक़ात कर ली

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Bil'aakhir Allah Ki Raza Se Hazrat Yusuf (Alaihay Salam) Ne Apni Pehchan Zahir Karke Apne Bhaiyon Aur Abbajan Yaqoob (Alaihay Salam) Se Mulaqat Kar Li
Bil'aakhir Allah Ki Raza Se Hazrat Yusuf (Alaihay Salam) Ne Apni Pehchan Zahir Karke Apne Bhaiyon Aur Abbajan Yaqoob (Alaihay Salam) Se Mulaqat Kar Li
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Bil’aakhir Allah Ki Raza Se Hazrat Yusuf (Alaihay Salam) Ne Apni Pehchan Zahir Karke Apne Bhaiyon Aur Abbajan Yaqoob (Alaihay Salam) Se Mulaqat Kar Li

हिकायत : युसूफ (अलैहिस्सलाम)

बिल’आखिर अल्लाह की राजा से हज़रत युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने अपनी पहचान ज़ाहिर करके अपने भाइयों और अब्बाजान याक़ूब (अलैहिस्सलाम) से मुलाक़ात कर ली.

युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने अपना इक़्तेदार बखूबी सम्भाला:

अज़ीज़ दोस्तों ,.. अल्लाह तआला फरमाते है की, “इस तरह हम ने युसूफ (अलैहिस्सलाम) को इस सर-ज़मीन में इक़्तेदार अत किया, वो जहा चाहते रहते, हम जिसे चाहते है नवाज़ते है और नेक लोगो का अजर ज़ाया (बेकार) नहीं करते”.

युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने अपना इक़्तेदार सम्भाला और अपने काम की तरतीब देने लगे. अनाजों को महफूज़ रखने के लिए बड़े-बड़े गोदाम (गोडाउन) बनाये गए. ये आप के इक़्तेदार समालने के बाद आठवा (8) साल है, जब कहत (सूखा) का दौर-दौरा था. आस पास के इलाको में गल्ला (अनाज) दस्तयाब न था. चारो तरफ सूखा पड़ा हुवा था, क्या इंसान क्या जानवर सब परेशान हो रहे थे उसी वक़्त बादशाह ने अपनी तमाम अवाम (पब्लिक) में मुनादी कराई. के हुकूमत के पास गल्ला (अनाज ) मौजूद है और हर अवामुन्नास को अनाज वाजिब दामों पर दिया जाएगा.
ये खबर युसूफ (अलैहिस्सलाम) के भाइयो को भी पहुँची.

तो वो लोग अनाज लाने मिश्र पहुँचे. युसूफ (अलैहिस्सलाम) अपने भाइयो को देखकर पहचान गए. लेकिन उनके भाइयो ने उनको ना पहचाना, क्योंकि जब उन लोगो ने उन्हें कुवे में फेका था उस वक़्त युसूफ (अलैहिस्सलाम) बच्चे थे और अब वो एक खूबसूरत जवान थे. युसूफ (अलैहिस्सलाम) अपने भाइयो को अपने साथ अपने मेहमान खाने में लेगए और उनकी मेहमान नवाज़ी की. और उनसे घर वालो का हाल दरियाफ्त (पुछा) किया. लेकिन अपनी पहचान छुपाये रखी.
केई बरस बाद अपने भाई (बिन यामीन) से मुलाक़ात:

युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने उनकी वापसी का सामान तैयार किया और कहा, “अब दुबारा आओ तोह अपने सौतेले भाई (बिन यामीन) को साथ ज़रूर लेते आना, तुम देखते नहीं की मैं कितना मेहमान नवाज़ हूँ, और अनाज का वज़न भी पूरा देता हूँ. और अगर तुम उसे मेरे पास नहीं लाये तो फिर मेरे पास ना तुम्हारे लिए कोई गल्ला (अनाज) है, और ना ही तुम लोग मेरे पास आना”.

वो कहने लगे की, “हम इस बात के लिए अपने अब्बा जान को आमादा करेंगे और ये काम कर के ही रहेंगे”. युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने अपने खादिमो (नौकरो) से कहा, “इनकी पूँजी (रुपया) इनके सामान में छुप के से रख दो, ताकि किसी को पता ना चल सके और जब वो अपने घरो में पहुँचे तोह इसे देख कर पहचान ले, और शायद दुबारा वापस आये”.

और जब उनके भाई अपने घर पहुँचे तो अपने अब्बा जान से कहा, “हमें गल्ला देने से इंकार कर दिया गया है, आप हमारे साथ बिन यामीन को भेजदे ताकि हमें गल्ला मिल सके, और हम यक़ीनन इस की हिफाज़त करेंगे”, याक़ूब (अलैहिस्सलाम) के सामने 20 साल पहले का मंज़र आ गया जब इन्होने हिले-बहाने कर के युसूफ (अलैहिस्सलाम) को अपने साथ ले कर गए थे.

याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “क्या मैं ऐसे ही तुम पर ऐतबार कारु?. जैसा इस से पहले इस के भाई के बारे में किया था, अल्लाह तआला ही बेहतर हिफाज़त कर ने वाला और रहेम करने वाला है ”. जब उनके भाइयो ने अपना सामान खोला तोह देखा की उनकी पूँजी (रुपया) भी उन्हें वापस कर दी गयी है तोह कहने लगे , “अब्बा जान हमें अब और क्या चाहिए, हमारी पूँजी भी लौटा दी गयी है, अब हम अपने घर वालो के लिए और अनाज लाएंगे और अपने भाई की हिफाज़त भी करेंगे , अब की बार जियादा अनाज लाएंगे . अब तो ये अनाज लाना भी आसान है”.
याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “जब तक तुम मुझे अल्लाह तआला पर पुख्ता अहद ना दोगे के तुम इसे मेरे पास लाओगे, मै इसे तुम्हारे साथ ना भेजूंगा. तुम इसकी जी जान से हिफाज़त करोगे”,

फिर जब इन्होने पुख्ता अहद किया तो याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “हमारी इस बात का अल्लाह तआला गवाह है”. फिर कहने लगे, “मेरे बेटो उस शहर में एक ही दरवाज़े से दाखिल ना होना, बल्कि अलग-अलग दरवाज़ों से दाखिल होना, मैं तुम्हे अल्लाह तआला की मैशियत से नहीं बचा सकता, हुक्म तो सिर्फ उसी का चलता है, मैं उसी पर भरोसा करता हूँ, और जिसे भी भरोसा करना हो उसी पर करना चाहिए”.

फिर सब भाई मिलकर युसूफ (अलैहिस्सलाम) के पास पहुँचे. युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाई बिन यामीन को अपने पास बिठाया, और उस से कहा की मै तुम्हारा बिछड़ा हुवा भाई युसूफ (अलैहिस्सलाम) हूँ. और उन्होंने उसे अपनी आप बीती बिन यामीन को बतायी और उनसे भी अपने अहले खाना (घर वालो) का हाल हवाल लिया. बिन यामीन ने कहा, ”आप की जुदाई में रो रोकर अब्बा जान की आँखों की रौशनी भी जाती रही. युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “अब सब ठीक हो जायेगा, तुम अभी इन्हे मेरे बारे में कुछ ना बताना, ये बात अपने दिल में रखना ”.

फिर जब युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने इन् लोगो का सामान तैयार किया तोह अपने `भाई बिन यामीन के थैले में अपने पानी पिने का पियाला रख दिया . युसूफ (अलैहिस्सलाम) के खादिमो (नौकरो) ने उनके भाई बिन यामीन के थैले में बादशाह का पानी पिने का पियाला जो की हीरे जवाहरात से जड़ा हुवा था दाल दिया. जब उनके भाई शहर के बाहर निकले तोह पीछे से बादशाह के सिपाहियों ने आवाज़ लगाई,

“ऐ काफिलों वालो तुम चोर हो, तुम ने बादशाह का पियाला चुराया है , और बादशाह ने उस पियाले को ढूंढ कर लाने वाले को एक उठ (कैमल) अनाज देने का ऐलान किया है”.
युसूफ (अलैहिस्सलाम) के भाइयो ने कहा, “हम इस मुल्क़ में फसाद करने नहीं आये है और ना ही हम चोर है, हम तो इज़्ज़तदार लोग है”.

सिपाहियों में से एक ने कहा, “अगर चोरी का माल तुम में से किसी के पास बरामद हुवा तो उसकी सज़ा क्या होगी? ”
भाइयो ने कहा, “जिस के पास से पियाला निकलेगा उसकी सज़ा ये ही होगी के उसे ही रख लिया जाए”. ये याक़ूब (अलैहिस्सलाम) की शरीयत थी के जो भी चोरी करे उसे जिसकी चोरी हुयी हो, एक साल तक गुलामी करनी पड़ेगी. जब की मिश्र का क़ानून ये था की चोर को जेल की सज़ा होती थी.

सब से पहले बाक़ी भाइयो के सामान की तलाशी ली गयी, फिर आखिर में बिन यामीन के सामान की तलाशी में वो पियाला निकल आया. सब भाइयो को युसूफ (अलैहिस्सलाम) के सामने पेश किया गया.
भाइयो ने कहा , “जिस तरह बिन यामीन ने चोरी की है उसी तरह बहुत अरसा पहले इनके भाई युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने भी चोरी की थी” .

ये सब बाते सुनकर भी युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने सब्र किया और अपने आप को ज़ाहिर ना किया और कहा, “तुम लोग जो बाते कह रहे हो वो बहुत बुरी है और अल्लाह तआला ही सब बातो को जानने वाला है”.
भाइयो को अपने अब्बा जान से किया हुवा वादा याद आ गया, बड़े भाई ने कहा मै मिश्र से बिन यामीन को लिए बिना वापस नहीं जाऊंगा यहाँ तक की मेरे अब्बा जान हुक्म दे या अल्लाह तआला की तरफ से कोई फैसला आये. उन्होंने युसूफ (अलैहिस्सलाम) से गुज़ारिश की के, “ हमारे अब्बा जान बहुत ज़ईफ़ है और वो इस बात को बर्दाश्त ना कर पाएंगे”. आप बिन यामीन के बदले हम में से किसी एक को रख ले.

इस पर युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “ अल्लाह तआला की पनाह ऐसे कैसे हो सकता है. अगर मैंने ऐसा किया तो ज़ालिमों में से हो जाऊंगा”. ये तदबीर अल्लाह तआला ने इसीलिए की थी के बिन यामीन को एक साल तक युसूफ (अलैहिस्सलाम) के साथ रहने का मौका मिल जाए.

भाई लोग रोते हुवे अपने घर पहुँचे और अपने अब्बा जान को सारी बाते बतायी, और कहा की अगर आप को हम पे यक़ीन नहीं है तो काफिले वालो से पूछ लो. हमने आप से वडा ज़रूर किया था पर इस बात पर वादा नहीं किया था.
याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने ये बाते सुनी तो उन्हें बड़ा सदमा लगा और वो निधाल हो गए. उन्होंने अपने लड़को से मुँह फेर लिया. और कहा मैं जो बाते अल्लाह तआला की तरफ से जानता हूँ, तुम नहीं जानते, जाओ मेरे दोनों बेटो को ढूंढ कर मेरे पास लावो. वो लोग फिर मिश्र गए और युसूफ (अलैहिस्सलाम) के सामने पेश हुवे और कहा की हमारे पास थोड़ी ही सी पूँजी (रुपया) है, आप इस के बदले हमें अनाज दे दीजिये, हम आप को बहुत रहेम करने वाला पाते है. हमें गल्ला दे दे की हम अपने घर वालो के पास ले जा सके”.

ये बाते उन्होंने बड़ी आजिज़ी और इन्केसारी से कही थी. युसूफ (अलैहिस्सलाम) को उन् पर रहेम आ गया, उन्होंने कहा, “तुम लोगो ने युसूफ (अलैहिस्सलाम) और उसके भाई के साथ अच्छा नहीं किया, जब तुम नादान थे, तुम लोगो ने जो चाले चली अल्लाह तआला ने तुम्हारी चालो से उनकी हिफाज़त की और उन्हें इज़्ज़त बख्शी. “युसूफ (अलैहिस्सलाम) के मुँह से ये बाते सुनकर भाइयो को बड़ा ता-अज्जुब हुवा, भाइयो ने कहा, “क्या आप युसूफ (अलैहिस्सलाम) हो ?” युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “हाँ मै ही युसूफ हूँ”.

भाइयो ने उनसे अपने गुनाहो की मुआफी मांगी, युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “अल्लाह तआला ही सब गुनाहो को मुआफ करने वाला है, ये सब शैतान ही का किया हुवा है की उसने हम भाइयो के बीच में नफरते पैदा की”. फिर उन्होंने भाइयो को अपनी कमीज दी और कहा, “इसे अब्बा जान के चेहरे पर दाल देना, इन्शाह अल्लाह उनकी आँखों की रौशनी वापस आ जाएगी, फिर तुम सब घरवालों को लेकर यहाँ आ जाना”.

इधर घर पर याक़ूब (अलैहिस्सलाम) अपने घरवालों से कहे रहे थे की, “अगर तुम ये ना समझो की मै उम्र की वजह से बाहेक गया हूँ, तो मुझे युसूफ (अलैहिस्सलाम) की खुशबू आ रही है”. घरवालों ने कहा, “आप तो अभी भी युसूफ (अलैहिस्सलाम) के गम में पड़े हुवे हो”. फिर जब याक़ूब (अलैहिस्सलाम) के बड़े बेटे जिनका नाम याक़ूब बिन यहूदा था. उसने युसूफ (अलैहिस्सलाम) की कमीज अपने अब्बा जान के चेहरे पर डाली तोह उनके आँखों की रौशनी वापस आ गयी.

ये वही याक़ूब बिन यहूदा था जिस ने आज से कई बरस पहले युसूफ (अलैहिस्सलाम) की कमीज में बकरी के बच्चे का खून लगा कर अपने अब्बाजान को युसूफ (अलैहिस्सलाम) की मौत की खबर दी थी. और अपने अब्बा जान को दुख और रंज-ओ-गम भर दिया था. और आज वो ही युसूफ (अलैहिस्सलाम) की कमीज दुबारा ले कर आया था. लेकिन आज वो अपने अब्बा जान के चेहरे पर ख़ुशी देखकर खुश था.

याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “मैंने कहा था की मै अल्लाह तआला की तरफ से वो बाते जानता हूँ जो की तुम नहीं जानते, और इंसान को मायूस नहीं होना चाहिए क्योंकि मायूसी शिर्क है”.’
जब पुरे घरवाले मिश्र पहुँचे तो युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने उनका शहर के बाहर ही इस्तक़बाल किया, पूरा शहर साथ में था, खुशिया और जश्न मनाया जा रहा था. युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने कहा मेरे साथ शहर चलो, इंशा अल्लाह वहा चैन और सुकून रहेगा. घर वालो ने जब युसूफ (अलैहिस्सलाम) का ये रूतबा ये मक़ाम देखा तो सब के सब सजदे में गिर गए. ये सजदा ताज़िमान था. ये वो ही खवाब की ताबीर थी जो युसूफ (अलैहिस्सलाम) ने बरसो पहले देखा था. लेकिन उस खवाब को ताबीर हो ने में पुरे 40 साल लग गए.

फिर युसूफ (अलैहिस्सलाम) अपने घरवालों को अपने साथ ले गए. अपने माँ-बाप को अपने तख़्त (राज सिहासन) पर बैठाया. और अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया की एक देहाती को अल्लाह तआला ने एक सरज़मीं का बादशाह बना दिया.
भाइयों और बहनो…. अल्लाह तआला अपने नेक बन्दों का अजर ज़ाया (बर्बाद) नहीं करता. अल्लाह तआला के इख्तियार में ही सब कुछ है वो चाहे तो गदावो को नवाज़ दे वो चाहे तो फ़क़ीरों को बादशाह कर दे और वो चाहे तो यतीमो को पयम्बर कर दे. इसीलिए अल्लाह तआला पर ही भरोसा रखो.
रिफरेन्स: (वर्चुअल स्टडी ऑफ़ मुहम्मद रफ़ीक, क़सस-उल-अम्बिया)
अगली पोस्ट हिकायत (पोस्ट-10) में लूत (अलैहिस्सलाम) के बारे में ज़िक्र करेंगे…..

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