सफर हज में नज़र की हिफाज़त और परदे का एहतेमाम

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Safre Hajj Me Nazar Ki Hifazat Aur Parde Ka Ahtemam
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Safre Hajj Me Nazar Ki Hifazat Aur Parde Ka Ahtemam

सफर हज में नज़र की हिफाज़त और परदे का एहतेमाम

हज के फ़ज़ाइल

पोस्ट न०-10

सफर हज में नज़र की हिफाज़त और परदे का एहतेमाम

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि अल्लाहुअन्हु से रिवायत है के हजजातुल विदा के मौके पर ( मुज़दलफा से मीना को

वापस होते हुए) फज़ल बिन अब्बास रज़ि अल्लाहुअन्हु हुज़ूर अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सवारी पर पीछे

बैठे हुए थे, क़बीला बानी खस’अम की एक औरत ( मसला मालूम करने के लिए ) बारगाहे रिसालत मे हाज़िर हुई ,

फज़ल बिन अब्बास रज़ि अल्लाहुअन्हु उस औरत को देखने लगे और वो औरत उनको देखने लगी ( चूँकि बाद नज़री

मरदों और औरतों दोनों के लिए सख्त मन है और हज जैसी इबादत के मौके पर गुनाह का इरतकाब संगीन है इसलिए )

हुज़ूर अक़दस (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फज़ल बिन अब्बास रज़ि अल्लाहुअन्हु का चेहरा पकड़ कर दूसरी तरफ

फेर दिया ( जिससे दोनों एक दुसरे की तरफ देखने से मेहफ़ूज़ हो गए )

इसके बाद उस औरत ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से सवाल किया के बिला शुभा अल्लाह के फ़रीज़े यानि

हज ने मेरे बूढ़े बाप को पा लिया है ( और वो इस क़दर बूढ़े और ज़ईफ़ हैं के) सवारी पर जैम कर नहीं बैठ सकते तो क्या

मैं उनकी तरफ से हज कर लूँ ?

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जवाब दिया के हाँ ( बाप की तरफ से हज कर लो )

(बुखारी शरीफ – 205)

इस हदीस से मालूम हुआ के सफरे हज मे मरदों और औरतों को बाद नज़री से बचने का ख़ास एहतेमाम करना लाज़िम है

, आज कल हज उमराह के सफर में बाद नज़री और बे परदगी हद से ज़्यादा होती है ,अच्छी खासी परदे वाली औरतें बुरखा उतार कर रख देती हैं और गोया ये समझती हैं के हज में पर्दा शरन नहीं है ये बड़ी जहालत की बात है,

हज़रत आएशा रज़ि अल्लाहुअन्हा का बयां है के ( सफरे हज में ) हमारे क़रीब से हाजी लोग गुज़रते थे और हम रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ अहराम बांधे हुए थे ( चूँकि अहराम में औरत को मुँह पर कपडा लगाना मन है इसलिए हमारे चेहरे खुले हुए थे और चूँकि पर्दा करना हज में भी लाज़िम है ) इसलिए जब हाजी लोग हमारे बराबर से गुज़रते तो हम बड़ी सी चादर को सर से गिरा कर चेहरे के सामने लटका लेते और जब हाजी लोग आगे बढ़ जाते तो हम लोग चेहरा खोल लेते थे

(अबू दाऊद)

मालूम हुआ सफरे हज में भी परदे का एहतेमाम करना लाज़िम है, इस वाक़िअ से मगरिब ज़ादा (मोर्डर्न) लोगो की तरदीद भी हो जाती है जो कहते हैं के चेहरा खोलना न महरम के सामने जाइज़ है , इसलिए नक़ाब वाला बुरखा अपनी औरतों को नहीं उड़ाते , अगर न महरम से चेहरा खोलना लाज़िम न होता तो हज़रत आएशा रज़ि अल्लाहुअन्हा और दीगर सहाबी औरतें हाजी लोगो से चेहरा छुपाने का एहतेमाम क्यों करतीं ?

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