हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने बूत परस्ती से इंकार करते हुए अल्लाह की राह में अपना घर, और रिश्ते छोड़ना…

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Hazrat Ibrahim (Alaihissalam) Ne Boot Parasti Se Inkar Karte Hue Allah Ki Raah Me Apna Ghar, Aur Rishte Chorhna
Hazrat Ibrahim (Alaihissalam) Ne Boot Parasti Se Inkar Karte Hue Allah Ki Raah Me Apna Ghar, Aur Rishte Chorhna
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Hazrat Ibrahim (Alaihissalam) Ne Boot Parasti Se Inkar Karte Hue Allah Ki Raah Me Apna Ghar, Aur Rishte Chorhna…

हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने बूत परस्ती से इंकार करते हुए अल्लाह की राह में अपना घर, और रिश्ते छोड़ना…

हिकायत : इब्राहिम (अलैहिस्सलाम)

हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने बूत परस्ती से इंकार करते हुए अल्लाह की राह में अपना घर, और रिश्ते छोड़ना…

अज़ीज़ दोस्तों ,… आज हम हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) का ज़िक्र करेंगे. इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह तआला के खलील (दोस्त) थे. आप को यहूदी, ईसाई (नसारा) और यहाँ तक की मक्का के मुशरिक (काफिर) भी अपना पेशवा (इमाम) मानते थे. लेकिन अल्लाह तआला ने क़ुरान में इरशाद फ़रमाया के, “इब्राहिम (अलैहिस्सलाम), न यहूद थे , न नसारा थे और न ही मुशरिक थे वो तो मुस्लिम थे और एक सू होकर एक अकेले अल्लाह तआला की इबादत करने वाले थे”.

इस्लाम या दीन-ऐ-मोहम्मदी असल में दीन-ऐ-इब्राहिम है.

इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) इराक में पैदा हुए, उनके वालिद का नाम आज़ार था. दोस्तों यहाँ पर थोड़ा सा इख़्तिलाफ़त है, के आज़ार, इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) के वलीद थे या चाचा (अंकल). खैर, वो शाही बूत खानो का मुहाफ़िज़ (हिफाज़त करने वाला) और बूतो को बना कर बेचा करता था. इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) को इब्तिदा (शुरू) ही से बूत परस्ती से नफरत थी.

एक दिन अँधेरी रात में उन्होंने एक सितारा (स्टार) देखा तो कहा, “क्या ये मेरा रब है ?” , फिर जब वो सितारा डूब गया तो कहा, “मैं डूबने वाले को पसंद नहीं करता. “फिर जब उन्होंने चाँद (मून) को देखा तो कहने लगे, “ये मेरा रब है ?” , फिर जब वो भी डूब गया तो कहने लगे, “अगर मेरे रब ने मेरी राहनुमाई न की तो मैं गुमराहों में से हो जावूँगा”.

फिर जब सूरज (सुन) को जगमगाता हुवा देखा तो कहा, “ये मेरा रब है ?, ये बहुत बड़ा है”.

इस तरह अल्लाह सुब्हानहु तआला उन्हें अपनी निशानियों का मुशाहिदा करवा रहा था या दिखा रहा था, फिर जब वो सूरज भी डूब गया तो कहने लगे, “ऐ मेरी क़ौम बिलासुभा मैं तुम्हारे तमाम शरीको से बेज़ार हूँ, मैं तो बस उस ही रब की इबादत करता हूँ, जिसने ज़मीन और आसमान को पैदा किया और जो सारे जहां का रब है”.

एक दिन इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने अपने वालिद से कहा, “अब्बा जान, आप ऐसी चीज़ो की इबादत क्यों करते हो जो न सुन सकती है न देख सकती है और न तुम्हारे किसी काम आ सकती है, अब्बा जान मेरे पास ऐसा इल्म आया है जो आप के पास नहीं आया, लिहाज़ा आप मेरे पीछे चलिए मैं आप को सीरत-ऐ-मुस्तक़ीम बतलावुगा.

अब्बा जान शैतान की इबादत न कीजिये वो तो अल्लाह तआला का नाफरमान है. मुझे डर है की अल्लाह तआला से आप को सज़ा मिलेगी और आप शैतान के साथी बन जायेगे”.

इस पर उनके वालिद ने कहा, “मैं तो तुझे ही गुमराही में पाता हूँ, क्या हम अपने इतने सारे माबूदों (बूतो) को छोड़कर, तेरे एक माबूद (रब) की इबादत करे? अगर तूने हमारे मा-अबूदो की तौहीन या बुरा भला कहना बंद न किया तो, मैं तुझे राजिम (दुत्कारना या सज़ा देना) कर दूंगा. जा निकल जा मेरे घर से”.

इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह तआला की राह में अपने घर से निकलना भी गवारा कर लिया. लेकिन जाते-जाते अपने वालिद से कहा, “मैं अपने रब से तुम्हारी बख्शीश की दुआ करूँगा, मेरा रब बहुत बख्शने वाला और रहीम है”. इतना कहकर इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) अपने वालिद का घर छोड़कर चले गए.

इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) अपने वालिद का घर छोड़कर अल्लाह तआला के दीन की तब्लीग के लिए अपनी क़ौम के पास गए. उन्होंने अपनी क़ौम को हक़ की दावत दी. और उन्हें एक अल्लाह “वह्दहू ला शरिकाल्हु” की तरफ बुलाया, लेकिन उनकी क़ौम अपनी जाहिलियत पे अदि रही.

इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम से पुछा – “ये तुम किसकी इबादत करते हो?” , वह कहने लगे, “हम बूतो की इबादत करते है, और उन्ही के पास बैठे है”.

*इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “जब तुम इन्हे पुकारते हो तो ये तुम्हारी पुकार का जवाब देते है. या तुम्हे कोई फायदा या नुक्सान पहुँचा सकते है”.

उन्होंने कहा “हमने अपने बाप-दादा को इनकी पूजा करते हुवे देखा है, इसीलिए हम भी इनकी इबादत करते है”.
इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “तुम और तुम्हारे बाप-दादा सब खुली गुमराही में हो.

मैं तुमसे और तुम्हारे बाप-दादा से और तुम जिस की इबादत करते हो सब से बेज़ार हूँ. ये सब तुम्हे जहन्नुम की तरफ ले जायेगे. और अल्लाह तआला के सिवाए तुम्हे जहन्नुम से बचाने वाला कोई न मिलेगा.

मेरा रब सारे जहां का मालिक है, जिस ने मुझे पैदा किया, वो ही मेरी रहनुमाई करता है, वो ही मुझे खिलाता और पिलाता है, और जब मैं बीमार पढता हूँ तो वो ही मुझे शिफा देता है, यहाँ तक की वो ही मुझे मारेगा और फिर ज़िंदा करेगा, और जिससे मैं उम्मीद रखता हूँ की क़यामत के दिन वो मेरी खटाये मुआफ करेगा”.

उन काफिरो ने कहा. “अगर तुम हमारे माबूदों की तौहीन करोगे और इन्हे बुरा भला कहना बंद न करोगे तो ये तुम्हे सजा देंगे, और तुम पर कोई भी मुसीबत दाल देंगे”.

*इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने कहा – “ये तुम्हारे माबूद बेचारे अपने ऊपर बैठी मख्खी तो भगा नहीं सकते, यहाँ तक की वो मख्खी अगर इनसे कोई सामान छीन कर ले जाए तो उसे वापस नहीं ला सकते, मेरा क्या बिगाड़ लेंगे. मैं तो सिर्फ अपने रब से डरता हूँ जिस के क़ब्ज़ा-ऐ-क़ुदरत में मेरी जान है, और जो मेरा ख़ालिक़ है”.

इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) की तब्लीग का असर उनकी क़ौम पर न हुवा, चन्द लोगो को छोड़कर बाक़ी लोग ईमान न लाये.

एक दिन उनकी क़ौम शाही जशन में शामिल होने के लिए गई. इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) नहीं गए उन्होंने कहा, “मेरी तबियत थोड़ी न-साज (खराब) है, इसीलिए मैं जशन में नहीं जाऊंगा, तुम लोग जाओ”.

उनकी क़ौम ने उन्हें पीछे छोढ़ दिया. इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) चुपके से उनके बूत खाने (मंदिर) में जा घुसे. और एक थाली में खाना लेकर उन बूतो से कहा, “लो खाना खावो”, फिर कहा, “तुम खाते क्यों नहीं, क्या हो गया है तुम्हे, तुम बोलते क्यों नहीं?”.

जब बूतो की तरफ से कोई जवाब न आया तो इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने एक कुल्हाड़ी से उस बुतखाने में जितने भी बूत रखे थे उनको तोड़ दिया सिवाए एक बड़े बूत के, और वो कुल्हाड़ी को उस बड़े बूत के गले में दाल दिया और वहा से चले गए. जब उनकी क़ौम के काफिर लोग जशन से वापस आये तो अपने बूतो का ये हाल देखकर बहुत गुस्से (एंग्री) में आ गए. और कहने लगे, “हमारे बूतो का ये हाल किसने किया, हम उसे सख्त से सख्त सज़ा देंगे”.

इस पर उनमे से एक ने कहा, “मैंने इब्राहिम को अपने बूतो के बारे में भला-बुरा कहते सुना है. हो सकता है उसी ने हमारे बूतो का ये हाल किया हो”.

इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) को वहा पर लाया गया, उनकी क़ौम ने उनसे पुछा, “हमारे बूतो का ये हाल तुमने किया ?” इस पर इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) बोले, “उस बड़े बूत से क्यों नहीं पूछते, शायद उसी ने बाक़ी बूतो को तोड़ा है, अगर ये जवाब देते हो तो इन ही से पूछ लो”.

ऐसे में उनकी क़ौम के पास कोई जवाब न था. उनकी क़ौम के लोगो ने कहा, “ये हमारे बूत जवाब नहीं देते”. इस पर हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने कहा, “फिर तुम इन की इबादत (पूजा) क्यों करते हो?”. उन की क़ौम के लोगो ने कहा, “ये काम तुम ने ही किया है इसीलिए हम तुम्हे इसकी सज़ा देंगे”. हम तुम्हारे हाथ पैर मुखालिफ सिम्त से कटवा देंगे या तुम्हे सूली पर चढ़ा देंगे”.

रिफरेन्स : (वर्चुअल स्टडी ऑफ़ मुहम्मद रफ़ीक, क़सस-उल-अम्बिया)

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