उमराह का मुक़म्मल तरीक़ा क्या है

0
60
Umrah ka muqammal tariqa kya hai
Umrah ka muqammal tariqa kya hai
Islamic Palace App

Umrah ka muqammal tariqa kya hai

उमराह का मुक़म्मल तरीक़ा क्या है

सवालात-ऐ-हज पोस्ट न०-21

उमराह का मुक़म्मल तरीक़ा क्या है…?

उमराह का बहुत आसान तरीक़ा बता रहा हूँ, आप भी पढ़े हज पर जाने वाले हज़रत को भी बताइये,


सफर का आगाज़

घर से रवानगी के वक़्त 2 रकाअत पढ़ कर अल्लाह तआला से क़ुबूलियत की दुआ करे,

ज़रूरत का तमाम सामान, पास पोर्ट, टिकट, अहराम की चादर, खर्च की रक़म वगेरा,

फ़र्ज़ नमाज़ क़स्र पढ़े

सफर 48 मील ( 77 Km तक़रीबन) होतो क़स्र पढ़ते है, ज़ुहर,अस्र, ईशा 4 की बजाये 2 पढ़े,
फजर, मग़रिब, वित्र पूरी पढ़े,

सुन्नते अगर इत्मीनान का वक़्त है तो पढ़ले, ना पड़े तो कोई गुनाह नहीं, लेकिन फजर की 2 रकात सुन्नत को ज़रूर पढ़े,


उमराह के अरकान

1- मीक़ात से उमरा का अहराम बांधना,

2- मस्जिदे हरम पहुँच कर बैतुल्लाह का तवाफ़ करना

3- सफा मरवा की साई करना,

4- सर के बाद मुंडवाना या कटवाना,


अहराम बांधना

सुन्नत के मुताबिक़ ग़ुस्ल करके अहराम बांधले,

2 रकआत निफल अदा करे,

उमराह की नियत करले,

3 मर्तबा तलबिया पढ़ले,

लब्बेक अल्लाहुम्मा लब्बेक, लब्बेक ला शारिका लका लब्बेक
इन्नल हमदा वल नि’अमाता लका वालमुल्का, ला शारिका लका,

मस्जिदे हरम पहुँचने तक यही तलबिया पढ़ते रहना है,


अहराम के मसाइल

ग़ुस्ल से फारिग होकर अहराम बाँधने से पहले खुशबु लगाना सुन्नत है,

औरतो के लिए अहराम का कोई ख़ास लिबास नहीं है आम लिबास पेहन ले, चेहरे से कपड़ा हटा ले, फिर नियत करके आहिस्ता से तलबिया पढ़ले,

औरते बालो की हिफाज़त के लिए अगर सर पर रुमाल बाँध ले तो कोई हर्ज नहीं, वज़ू के वक़्त इसको खोलकर सर पर मसह ज़रूरी है,

अगर कोई औरत ऐसे वक़्त में मक्का मुकर्रमा पहुंची के माहवारी आ रही होतो वो पाक होने तक इंतज़ार करे, पाक होने के बाद ही उमराह करने के लिए मस्जिदे हरम में जाये, उमराह की अदायगी तक उसको अहराम में ही रहना होगा,

अगर आप पहले मदीना मुनव्वरा जा रहे हैं तो मदीना मुनव्वरा जाने के लिए किसी अहराम की ज़रूरत नहीं है लेकिन जब आप मदीना मुनव्वरा से मक्का मुकर्रमा जाये तो फिर मदीना की मीक़ात पर अहराम बांधे,

अहराम की हालत में अगर एहतलाम हो जाये तो इससे अहराम में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, कपड़ा जिस्म धोकर ग़ुस्ल करले, अगर अहराम की चादर बदलने की ज़रूरत होतो दूसरी चादर इस्तेमाल करले , लेकिन मिया बीवी वाले ख़ास ताल्लुक़ात से बिलकुल दूर रहे,


एक अहम हिदायत

मीक़ात पर पहुँच कर या इससे पहले अहराम बांधना ज़रूरी है,

लेकिन अगर आप हवाई जहाज़ से जा रहे हैं और आपको जद्दह में उतरना है तो हवाई जहाज़ में सवार होने से पहले ही अहराम बांधले या हवाई जहाज़ में मीक़ात से पहले पहले बांधले, और अगर मौक़ा होतो 2 रकआत भी अदा करले, फिर नियत करके तलबिया पढ़ले,

अहराम बाँधने के बाद नियत करने और तलबिया पढ़ने में ताख़ीर की जा सकती है, यानि आप अहराम हवाई जहाज़ में सवार होने से पहले बांधले और नियत मीक़ात आने से पहले करके तलबिया पढ़ले,

याद रहे के नियत और तलबिया के बाद ही अहराम की पाबन्दी शुरू होती है,


तम्बीह

अगर मीक़ात से बहार रहने वाला (जिसको आफ़ाक़ी कहते है) बगैर अहराम मीक़ात से गुज़र गया तो आगे जाकर किसी भी जगह अहराम बांधले लेकिन उस पर एक दम लाज़िम हो गया,

मसलन रियाद का रहने वाला बगैर अहराम के जद्दा पहुँच गया तो जद्दा या मक्का मुकर्रमा से अहराम बाँधने पर एक दम देना होगा,


मामूआत अहराम

अहराम बाँध कर तलबिया पढ़ लेने के बाद ये चीज़े हरम है

खुशबु लगाना,
नाख़ून काटना
जिस्म से बाल दूर करना
चेहरे का ढांकना,
मिया बीवी वाले ख़ास ताल्लुक़ात, जिन्सी सोहबत के काम करना,
खुश्की के जानवरो का शिकार करना,


सिर्फ मर्दो के लिए ममनू

सिले हुए कपड़े पहनना
सर को टोपी या कपड़े से ढांकना,
ऐसा जूता पहनना जिससे पाँव की दरम्यानी हड्डी छुप जाये,


मकरूहाते अहराम

बदन से मेल दूर करना,
साबून का इस्तेमाल करना
कंघा करना


अहराम की हालत में जाइज़ उमूर

ग़ुस्ल करना लेकिन खुशबूदार साबुन का इस्तेमाल ना करे
अहराम को धोना या बदलना
अंगूठी, घड़ी, चश्मा, बेल्ट, छतरी वगेरा का इस्तेमाल करना
अहराम के ऊपर मज़ीद चादर दाल कर सोना, लेकिन मर्द अपने सर और चेहरे को और औरते अपने चेहरे को खुला रखे,


मस्जिदे हरम की हाजरी

मक्का मुकर्रमा पहुँच कर सामान वगेरा अपनी क़यामगाह में रखकर आराम की ज़रूरत होतो थोड़ा आराम करले वरना ग़ुस्ल या वज़ू करके उमराह करने मस्जिदे हरम की तरफ सुकून, इत्मीनान के साथ तलबिया पढ़ते हुए जाये,

दरबारे इलाही की अज़मत व जलाल का लिहाज़ रखते हुए दाया क़दम अंदर रख कर मस्जिद में दाखिल होने की दुआ पढ़ते हुए दाखिल हो जाये,


काबा शरीफ पर पहली नज़र

जिस वक़्त खाना काबा पर पहली नज़र पढ़े तो अल्लाह तआला की बड़ाई बयान करके जो चाहे अपनी जुबां में अल्लाह तआला से मांगे, क्युकी या दुआ क़ुबूल होने का ख़ास वक़्त है,


तवाफ़

मस्जिदे हरम में दाखिल होकर काबा शरीफ के उस हिस्से में आ जाये जहा हज्रे अस्वद लगा हुआ है और तवाफ़ की नियत करले

उमराह की साई भी करनी है इसलिए मर्द हज़रात इज़्तबा करले यानि अहराम की चादर को दाए बगल के निचे से निकाल कर मोंढे के ऊपर डालले,

फिर हज्रे अस्वद के सामने खड़े होकर ‘ बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर” कहते हुए हज्रे अस्वद को बोसा ले या दोनों हाथो की हथेलियों को हज्रे अस्वद की तरफ करके हाथ का बोसा ले

फिर काबा को बायीं तरफ रखकर तवाफ़ शुरू करे,

मर्द हज़रात पहले 3 चक्कर में ( अगर मुमकीन होतो) रमल करे यानि ज़रा मोंधा हिलाकर अकड़ते हुए छोटे छोटे क़दम के साथ तेज़ चले,

तवाफ़ के वक़्त निगाह सामने रखे यानि काबा शरीफ आपके बायीं जानिब रहे,

तवाफ़ के दौरान बगैर हाथ उठाये याद होतो दुआए करते रहे या ज़िक्र करते रहे,

आगे एक निस्फ़ दायरे की शक्ल की 4-5 फुट ऊँची दिवार आपके बायीं जानिब आएगी इसको हतीम कहते है,

हतीम दरअसल बैतुल्लाह का ही हिस्सा है, इसमें नमाज़ पढ़ना ऐसा ही है जैसे बैतुल्लाह के अंदर नमाज़ पढ़ना, अगर तवाफ़ के बाद मौक़ा मिल जाये तो ज़रूर निफल अदा करे,

इसके बाद जब खाना काबा का जब तीसरा कोना आ जाये जिसको रुकने यमानी कहते है, (अगर मुमकिन होतो) दोनों हाथ या सिर्फ दाहिना हाथ उस पर फेरे या उसकी तरफ इशारा किये बगैर यूही गुज़र जाये,

रुकने यमानी और हज्रे अस्वद के दरमियान चलते हुए ये दुआ बार बार पढ़े,

रब्बना अतिना फ़िद्दुन्या हँसानातंव व फील आख़िरति हँसानातंव व कीना अज़ाबान नार

फिर हज्रे अस्वद के सामने पहुँच कर उसकी तरफ हथेलियों का रुख करे, बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कहे और हथेलियों का बोसा ले,

इस तरह आपका एक चक्कर पूरा हो गया, इसके बाद बाक़ी 6 चक्कर बिलकुल इसी तरह पुरे करे, कुल 7 चक्कर करने हैं, आखरी चक्कर के बाद हज्रे अस्वद का इस्तलाम करे और सफा चले जाये,


तवाफ़ के बाज़ अहम मसाईल

मस्जिदे हरम में देखील होने के बाद तलबिया बंद करदे,

तवाफ़ के दौरान कोई मख़सूस दुआ ज़रूरी नहीं बल्कि जो चाहे और जीस जुबां में चाहे दुआ मांगते रहे, अगर कुछ भी ना पड़े खामोश रहे तब भी तवाफ़ सही होगा,

तवाफ़ के दौरान जमात की नमाज़ शुरू होने लगे या थकन हो जाये तो तवाफ़ रोकदे फिर जिस जगह से तवाफ़ बंद किया था उसी जगह से तवाफ़ शुरू करदे,

निफलि तवाफ़ में रमल यानि अकड़ कर चलना और इज़्तिबा नहीं होता,

नमाज़ की हालत में बाज़ुओ को ढकना चाहिए क्युकी इज़्तिबा सिर्फ तवाफ़ की हालत में सुन्नत है

अगर तवाफ़ के दौरान वज़ू टूट जाये तो तवाफ़ रोककर वज़ू करके फिर तवाफ़ उसी जगह से शुरू करदे जहा से तवाफ़ बंद किया था, क्युकी बगैर वज़ू तवाफ़ करना जाइज़ नहीं,

तवाफ़ निफलि हो या फ़र्ज़ उसमे 7 ही चक्कर होते है, और इसकी इब्तिदा हज्रे अस्वद के इस्तलाम से ही होती है और इसके बाद 2 रकआत नमाज़ पढ़ी जाती है,

अगर तवाफ़ के चक्करो की तादाद में शक हो जाये तो कम तादाद शुमार करके बाक़ी चक्करो से तवाफ़ मुकम्मल करे,
मस्जिदे हरम के अंदर ऊपर या निचे या मुताफ़ में किसी भी जगह तवाफ़ कर सकते है

तवाफ़ हतीम के बहार से ही करे, अगर हतीम के अंदर दाखिल होकर तवाफ़ करेंगे तो वो मोतबर नहीं,

किसी औरत को तवाफ़ के दौरान हैज़ आ जाये तो फ़ौरन तवाफ़ बंद करदे और मस्जिद से बहार चली जाये,

ख्वातीन तवाफ़ में रमल यानि अकड़कर चलना ना करे ये सिर्फ मर्दो के लिए ख़ास है

हुजूम होने की सूरत में ख्वातीन हज्रे अस्वद का बोसा लेने की कोशिश ना करे बस दूर से इशारा करले, इसी तरह हुजूम होने पर रुकने यमानी को भी ना छुए

अगर हज्रे अस्वद के सामने से इशारा किये बगैर गुज़र गए और अगर हुजूम ज़्यादा है तो वापस आने की कोशिश ना करे क्युकी तवाफ़ के दौरान हज्रे अस्वद का बोसा लेना, उसकी तरफ इशारा करना सुन्नत है वाजिब नहीं,


अहम मसला

माज़ूर शख्स जिसका वज़ू नहीं ठहरता ( मसलन पेशाब के क़तरे मुसलसल गिरते हो या मुसलसल रियाह ख़ारिज होती रहती हो या औरत को बीमारी का खून आ रहा हो) तो उसके लिए हुक्म ये है के वो नमाज़ के एक वक़्त में वज़ू करे, फिर उस वज़ू से उस वक़्त में चाहे जितने तवाफ़ करे, नमाज़े पढ़े, तिलावत करे, दूसरी नमाज़ का वक़्त दाखिल होते ही वज़ू टूट जाएगा, अगर तवाफ़ मुकम्मल होने से पहले ही दूसरी नमाज़ का वक़्त दाखिल हो जाये तो वज़ू करके तवाफ़ मुकम्मल करे,


2 रकआत नमाज़

तवाफ़ से फारिग होकर मक़ामे इब्राहिम के आये, सहूलियत से मक़ामे इब्राहिम के पीछे जगह मिल जाये तो वह, वार्ना मस्जिदे हराम में किसी भी जगह तवाफ़ की 2 रकअत अदा करे,

तवाफ़ की इन 2 रकअत के मुताल्लिक़ नबी अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत ये हे के पहली रकअत में सूरह काफ़िरून और दूसरी रकअत में सूरह इखलास पढ़ी जाये,

हुजूम के दौरान मक़ामे इब्राहिम के पास तवाफ़ की 2 रकअत नमाज़ पढ़ने की कोशिश न करे क्युकी इससे तवाफ़ करने वालो को तकलीफ होती हे, बल्कि मस्जिदे हराम में किसी भी जगह अदा करले,


मक़ामे इब्राहिम

ये एक पत्थर हे जिस पैर खड़े होकर हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने काबा को तामीर किया था, उस पत्थर पैर हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के क़दमों के निशानात हैं,

ये काबा शरीफ के सामने एक जालीदार शीशे के छोटे से क़ुब्बा में मेहफ़ूज़ हे, जिसके अतराफ़ पीतल की खुशनुमा जाली

Read More:

हज में जाने वालों को हक़ीक़ी तय्यारी क्या करनी चाहिए

हज की याददाश्त के वास्ते हम तस्वीर निकाल सकते है क्या


Follow Us

हमारा फेसबुक पेज लाइक करने के लिए यहाँ क्लिक करें

अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

ISLAMIC PALACE को लाइक करने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। जिन्होंने लाइक नहीं किया तो वह इसी तरह की दीन और इस्लाम से जुड़ी हर अहम बातों से रूबरू होने के लिए हमारे इस पेज Islamic Palace को ज़रूर लाइक करें, और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को शेयर के ज़रिये पहुंचाए। शुक्रिया


For More Msgs Click This Link
www.islamicpalace.in

बराये करम इस पैग़ाम को शेयर कीजिये अल्लाह आपको इसका अजरअज़ीम ज़रूर देगा
आमीन

►जज़ाकअल्लाह खैरन◄

PLEASE SHARE

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.