हज का मुक़म्मल तरीक़ा क्या है

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Hajj Ka Muqammal Tariqa Kya Hai
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Hajj Ka Muqammal Tariqa Kya Hai

हज का मुक़म्मल तरीक़ा क्या है

सवालात-ऐ-हज पोस्ट न०-20

हज का मुक़म्मल तरीक़ा क्या है?

हज का बोहत आसान तरीक़ा बता रहा हूँ, आप भी पढ़े हज पर जाने वाले हज़रत को भी बताइये,


हज के 5 दिन , पहला दिन – 8 ज़िलहिज्जा

आज तुलु आफताब के बाद हालते अहराम में सब हाजियो को मीना जाना है, मुफर्रिद (जिसका अहराम सिर्फ हज का है)

और क़रीन (जिसका अहराम हज और उमराह दोनों का है) उनके अहराम पहले से बँधे हुए है,

मुतमत्ता (जुसने उमराह करके अहराम खोल दिया था) और इसी तरह अहले हरम आज हज का अहराम बांधे,

सुन्नत के मुताबिक़ ग़ुस्ल करके अहराम की चादरे पहन ले,

अहराम के लिए 2 रकअत पढ़े और हज की नियत करके तलबिया पढ़े,

तलबिया पढ़ते ही अहराम शुरू हो गया,, अब अहराम की तमाम पाबंदिया लाज़िम हो गयी (जो पहले गुज़र चुकी है),

इसके बाद मीना को रवाना हो जाये,

मीना मक्का मुकर्रमा से 3 मील के फासले पर 2 तरफ़ा पहाड़ो के दरमियान एक बहुत बड़ा मैदान है, 8 वी तारिख की

ज़ुहर से 9 वी तारिख की सुबह तक मीना में 5 नमाज़े पढ़े और इस रात को मीना में क़याम करना सुन्नत है,

अगर इस रात को मक्का मुकर्रमा में रहा या अराफात में पहुँच गया तो मकरूह है,


हज के 5 दिन, दूसरा दिन – 9 ज़िल्हिज्जा–क़िस्त-1

आज हज का सबसे बड़ा रुक्न यानि वक़ूफ़े अरफ़ा अदा करना है, जिसके बगैर हज नहीं होता,

तुलु आफताब के बाद जब कुछ धुप फेल जाये मीना से अराफात के लिए रवाना हो जाये जो मीना से तक़रीबन 6 मील है,

मीना से अराफात के लिए रवाना होते वक़्त तलबिया, तहलील, तकबीर, दुआ और दरूद पढ़ते हुए चले,

फिर जब जबले रहमत पर नज़र पढ़े (जो मैदाने अराफात में एक पहाड़ है) तो तस्बीह,

तहलील व तकबीर कहे और जो चाहे दुआ मांगे,

9 वी ज़िलहिज्जा को ज़वाल के बाद सुबह सादिक़ के दरमियानी हिस्से में अहरामे हज की हालत में अगर थोड़ी सी देर के

लिए भी अराफात में ठहर जाये या वह से गुज़र जाये तो हज हो जायेगा,

अगर उस वक़्त में ज़रा देर के लिए भी अराफात ना पहुंचा तो हज नहीं होगा,


हज के 5 दिन, दूसरा दिन– 9 ज़िलहिज्जा–क़िस्त -2

मुस्तहब ये है के ज़वाल के बाद ग़ुस्ल करले और इसका मौक़ा ना मिले तो वज़ू करले और वक़्त की इब्तिदा में नमाज़ अदा

करके वक़ूफ़ शुरू करदे,

सुन्नत तरीक़ा ये है के ज़ुहर और असर की नमाज़ इकट्ठी अमीरे हज की इक़तिदा में पढ़ी जाये,

यानि असर को भी ज़ुहर के वक़्त में पढ़ले, वहा जो बड़ी मद्जिद है जिसको मस्जिदे नमरा, इसमें इमाम दोनों नमाज़े इकट्ठी पढ़ाता है,

लेकिन चूँकि हर शख्स वहा पहुंच नहीं सकता और सब हाजी इसमें शामिल नहीं हो सकते और बगैर अमीरे हज की

इक़तिदा के दोनों नमाज़ो को जमा करना भी दुरुस्त भी नहीं है,

इसलिए इंडिया , पाक, बंगलादेश, अफ़ग़ानिस्तान वगेरा के हनफ़ी उलमा हाजियों को यही फतवा देते हैं के वो अपने

अपने खेमो में ज़ुहर के वक़्त में और असर के वक़्त में बा-जमात पढ़े और नमाज़ो के अलावा जो वक़्त है

उसे ज़िक्र व दुआ और तलबिया में लगाए


वक़ूफ़ ऐ अराफात-1

ज़वाल के बाद से ग़ुरूब तक पूरे मैदाने अराफात में जहा चाहे वक़ूफ़ कर सकते हैं,

मगर अफ़ज़ल ये है के ‘” जबले रहमत “, जो अराफात का मशहूर पहाड़ है,

उसके क़रीब जिस जगह हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने वक़ूफ़ किया था, उस जगह वक़ूफ़ करे,

बिलकिलुल उस जगह मुमकिन ना होतो जितना उससे क़ाबीब हो बेहतर है,

लेकिन अगर ” जबले रहमत” के पास जाने में दुश्वारी हो या वातलाशे वक़्त अपना खेमा तलाश करना मुश्किल होतो अपने खेमो में वक़ूफ़ करे,

बेहतर ये है के क़िब्ला रुख खड़ा होकर मगरिब तक वक़ूफ़ करे और हाथ उठाकर दुआएं करता रहे, अगर पूरा वक़्त

खड़ा ना हो सके तो जिस क़दर भी खड़ा रह सकता हो खड़ा रहे,

फिर बेथ जाये, फिर जब क़ुव्वत हो खड़ा हो जाये और पूरे वक़्त में खुशु खुज़ु और गिरयावज़री के साथ ज़िक्रउल्लाह,

दुआ, अस्तगफार में मशगूल रहे, और थोड़े थोड़े वक़्त में तलबिया पड़ता रहे,

और दिनी व दुनियावी मक़सद के लिए अपने वास्ते, अपने मुतल्लिक़ीन व अहबाब के वास्ते, खासकर उन लोगो के वास्ते

जिन्होंने दुआ के लिए दरख्वास्त की है और तमाम मुसलमानो के लिए दुआएं मांगे,

ये वक़्त कुबिलियाते दुआ का ख़ास वक़्त है और हमेशा नसीब नहीं होता, इस दिन बिला ज़रूरत आपस की जाइज़ गुफ्तगू

से परहेज़ करे, पूरा वक़्त दुआओं, ज़िक्रउल्लाह में सर्फ़ करे,


अराफात से मुज़दलफा रवानगी

मुज़दलफा अराफात से वापस मक्का मुकर्रमा की तरफ 3 मील के फासले पर है,

आफताब ग़ुरूब होते ही मुज़दलफा के लिए रवाना हो जाये, रास्ते में ज़िक्रउल्लाह और तलबिया पड़ता रहे,

इस रोज़ हुज्जाज को मगरिब की नमाज़ अराफात या रास्ते में पढ़ना जाइज़ नहीं,

वाजिब ये है के मगरिब को मुअखर करके ईशा के वक़्त नमाज़े ईशा के साथ पढ़े,

मुज़दलफा पहुंचकर अव्वल मग़रिब के फ़र्ज़ पढ़े और फ़ौरन बाद ईशा के फ़र्ज़ पढ़े,

मग़रिब की सुन्नते, ईशा की सुन्नते और वित्र बाद में पढ़े,

मुज़दलफा में मग़रिब व ईशा दोनों नो नमाज़े एक अज़ान और एक अक़ामत से पढ़ी जाये और मुज़दलफा में दोनों नमाज़ो

को इकठ्ठा पढ़ने के लिए जमात शर्त नहीं, तनहा हो तब भी इकठ्ठा करके पढ़े,

अगर मग़रिब की नमाज़ अराफात में या रास्ते में पड़ली तो मुज़दलफा पहुंचकर इसको दोहराना वाजिब है,

अगर ईशा के वक़्त से पहले मुज़दलफा पहुँच गया तो अभी मग़रिब की नमाज़ ना पढ़े, ईशा के वक़्त का इंतज़ार करे

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